5.11

संस्कृत

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये ॥

kāyena manasā buddhyā kevalair indriyair api yoginaḥ karma kurvanti saṅgaṃ tyaktvātmaśuddhaye

अनुवाद

योगीजन आसक्ति को त्यागकर आत्मशुद्धि के लिए शरीर, मन, बुद्धि और केवल इन्द्रियों से भी कर्म करते हैं।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह श्लोक कर्म के पूरे साधन को एक-एक करके गिनाता है — शरीर (काय), मन (मनस्), बुद्धि, और इन्द्रियाँ भी (इन्द्रिय)। इस तरह यह अनासक्ति को केवल एक मानसिक युक्ति मानने के बजाय पूरे मनो-दैहिक तंत्र को इस अनुशासन में ले आता है। बताया गया उद्देश्य आत्मशुद्धि है, यानी आत्मा की शुद्धि, स्वयं मोक्ष नहीं। यहाँ कर्म को शुद्ध करने वाले साधन के रूप में नए ढंग से देखा गया है, ठीक वैसे ही जैसे लगातार किया गया अभ्यास किसी एक नाटकीय त्याग की तुलना में चरित्र को कहीं अधिक भरोसेमंद ढंग से गढ़ता है। यह उन सबके लिए एक व्यावहारिक उत्तर है जो योग को निष्क्रिय होकर पीछे हट जाना समझते हैं — योगी ठीक वही करता है जो बाकी सब करते हैं, बस उसमें “मैं कर्ता हूँ” का वह भाव नहीं होता जो कर्म को बंधन में बदल देता है। आत्मशुद्धये — “आत्मा की शुद्धि के लिए” — आरंभिक अवस्थाओं में कर्म की भूमिका बताता है: यह अभी मोक्ष नहीं है, बल्कि वह अनुशासन है जो व्यक्ति को उसके योग्य बनाता है। इसीलिए गीता 5.6 योग को संन्यास की पूर्वशर्त बताती है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

kāyena manasā buddhyāकायेन मनसा बुद्ध्या
शरीर, मन और बुद्धि से (kāyena + manasā + buddhyā)
kevalair indriyair apiकेवलैः इन्द्रियैः अपि
और केवल इन्द्रियों से भी (kevalaiḥ + indriyaiḥ + api)
yoginaḥ karma kurvantiयोगिनः कर्म कुर्वन्ति
योगी कर्म करते हैं (yoginaḥ + karma + kurvanti)
saṅgaṃ tyaktvātmaśuddhayeसङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये
आसक्ति त्यागकर, आत्मशुद्धि के लिए (saṅgam + tyaktvā + ātma-śuddhaye)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Elsewhere the Gita treats the senses mainly as a liability — the site of craving, the thing that has to be restrained. This verse quietly includes them anyway, “even the senses,” among the legitimate instruments performing purifying action. It’s a small but real course-correction: the senses aren’t cast as an enemy to be defeated so much as one more tool in the same kit as body, mind, and intellect, usable for the same purifying work rather than only ever working against it.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • अपने भीतर के जिन हिस्सों पर आपने भरोसा न करना सीख लिया है — भूख, आवेग, इच्छा — उन्हें केवल दबाने योग्य बोझ न मानें; इस श्लोक में बताई गई इन्द्रियों की तरह, उन्हें भी उसी विकास के साधन बनने की दिशा में मोड़ा जा सकता है जिसकी ओर आप बढ़ रहे हैं, वे केवल उसकी राह की बाधाएँ नहीं हैं।

व्यावसायिक

  • आपकी टीम में जिस गुण को आप आम तौर पर जोखिम मानते हैं — तेज़ अंतर्ज्ञान, दृढ़ राय — अगर वह वास्तव में सही लक्ष्य की ओर लगा हो, तो उसे आदतन दबाने के बजाय उसका उपयोग करें; दिशा के अनुसार वही गुण बोझ भी हो सकता है और पूँजी भी।

परिवार और समाज

  • परिवार के किसी सदस्य का जो गुण आपको ज़्यादातर एक समस्या लगता रहा है — ज़िद, स्पष्टवादिता — सही दिशा में लगने पर ठीक वही ज़रूरी हो सकता है; यह न मान लें कि हर प्रबल गुण से बचकर ही चलना होगा, उसके साथ मिलकर भी काम किया जा सकता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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