5.29

संस्कृत

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥

bhoktāraṃ yajñatapasāṃ sarvalokamaheśvaram suhṛdaṃ sarvabhūtānāṃ jñātvā māṃ śāntim ṛcchati

अनुवाद

मुझे यज्ञों और तपों का भोक्ता, समस्त लोकों का महेश्वर और सभी प्राणियों का सुहृद् जानकर वह शान्ति को प्राप्त होता है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

बीस से अधिक श्लोकों की मुख्यतः निर्वैयक्तिक भाषा — ब्रह्म, आत्मा, सनातन, परम — के बाद अध्याय का अंतिम श्लोक तेज़ी से उत्तम पुरुष की ओर लौटता है। यहाँ कृष्ण सीधे अपना नाम लेकर स्वयं को यज्ञ और तप का भोक्ता, सब लोकों का महान स्वामी और सब प्राणियों का सुहृत्, यानी मित्र, बताते हैं। बेसेंट का अनुवाद सुहृद् के लिए “सब प्राणियों का प्रेमी” शब्द चुनता है। यह शाब्दिक “मित्र” या “हितैषी” से अधिक आत्मीय शब्द है। अनुवाद जो भी हो, यह शब्द महत्त्वपूर्ण है: यह एक ऐसे बंधन को नाम देता है जो संबंध पर टिका है, लेन-देन पर नहीं। यही विशेषण आगे चलकर कृष्ण के आत्म-वर्णनों में फिर आता है, 9.18 के शरणं सुहृत् में, अर्थात् शरण और मित्र। ध्यान के ठोस निर्देश देने वाले दो श्लोकों के ठीक बाद आकर यह अंतिम श्लोक चुपचाप पूरी पिछली विधि को नए अर्थ में रख देता है। इन्द्रियों को समेटना, श्वास को स्थिर करना और मन को शांत करना, इन सबका अंतिम उद्देश्य केवल किसी अवस्था को पाना नहीं, बल्कि एक संबंध को पहचानना है। इसी के साथ अध्याय ‘शांति’ शब्द पर समाप्त होता है, जो श्लोक 12 से उसकी टेक रहा है। सुहृत् सर्वभूतानाम् — “हर प्राणी का मित्र” — अध्याय के मध्य भाग के निर्वैयक्तिक ब्रह्म को ऐसा बना देता है जिसे संबोधित किया जा सके। आधार से प्रभु की ओर यही मोड़ गीता 4.35 में भी आता है और अध्याय 7–12 का पूरा विषय बन जाता है। इस श्लोक में जिस शांति का वचन दिया गया है, उसका “कौन” ईश्वर है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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शब्द-दर-शब्द

bhoktāraṃ yajñatapasāṃभोक्तारं यज्ञतपसां
यज्ञों और तपों का भोक्ता (bhoktāram + yajña-tapasām)
sarvalokamaheśvaramसर्वलोकमहेश्वरं
सभी लोकों का महान ईश्वर (sarva-loka-maha-īśvaram)
suhṛdaṃ sarvabhūtānāṃसुहृदं सर्वभूतानां
सभी प्राणियों का सुहृद (suhṛdam + sarva-bhūtānām)
jñātvā māṃ śāntim ṛcchatiज्ञात्वा मां शान्तिं ऋच्छति
मुझे जानकर शान्ति प्राप्त करता है (jñātvā + mām + śāntim + ṛcchati)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Arjuna opened this chapter demanding a single, conclusive, conceptual answer — renunciation or yoga, pick one (verse 1). Twenty-eight verses of careful argument later, the chapter’s actual closing move isn’t a sharper concept at all; it’s a relationship, Krishna as suhṛt, friend, of all beings. The chapter spends its whole length sharpening philosophical distinctions and then, at the very end, quietly suggests the destination those distinctions were pointing toward was never a concept to finally get right, but someone to know.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप अपने जीवन के किसी कठिन प्रश्न पर वैचारिक स्पष्टता के पीछे भाग रहे हों, तो ध्यान दें कि कहीं असली समाधान, जब वह आए, बौद्धिक के बजाय संबंधों से जुड़ा तो नहीं निकलता — कोई भरोसेमंद संबंध उस बात को सुलझा देता है जिसे कितना भी सही सोचना नहीं सुलझा पाया था।

व्यावसायिक

  • जब आपकी टीम किसी तकनीकी या प्रक्रिया-संबंधी प्रश्न पर थकने तक बहस करती है, तो ध्यान दें कि असली समाधान कभी-कभी सबसे पैने तर्क की जीत नहीं होता, बल्कि एक भरोसेमंद कामकाजी संबंध होता है, जिससे बची हुई असहमति उतनी मायने नहीं रखती।

परिवार और समाज

  • यदि आप किसी लंबे समय से चली आ रही पारिवारिक असहमति को सोच-विचार के बल पर सुलझाने की कोशिश में अटके हुए हैं, तो सोचिए कि जो चीज़ उसे वास्तव में सुलझाती है, वह शायद कोई बेहतर तर्क बिल्कुल न हो, बल्कि बस संबंध पर इतना भरोसा करना हो कि असहमति कम मायने रखने लगे।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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