4.35

संस्कृत

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥

yaj jñātvā na punar moham evaṃ yāsyasi pāṇḍava yena bhūtāny aśeṣeṇa drakṣyasy ātmany atho mayi

अनुवाद

हे पाण्डव, उसे जानकर तुम फिर इस प्रकार मोह में नहीं पड़ोगे, और उसी के द्वारा तुम सभी प्राणियों को बिना किसी अपवाद के आत्मा में और फिर मुझमें देखोगे।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

उस उपदेश का बताया गया फल सम्पूर्ण है: फिर कभी मोह, यानी भ्रम में न पड़ना, और हर प्राणी को बिना किसी अपवाद के पहले आत्मा में और फिर उसके द्वारा कृष्ण में स्थित देखने की दृष्टि। मोह शब्द सीधे अध्याय 1 में अर्जुन की अपनी दशा तक पहुँचता है — शोक और भ्रम से उपजी वह जड़ता जिससे पूरा संवाद आरम्भ हुआ था — और यह श्लोक चुपचाप यह वचन देता है कि इस अध्याय में जिस ज्ञान का वर्णन हो रहा है, वह उसी विशेष टूटन का उपचार है, न कि किसी सामान्य, अमूर्त अर्थ वाले भ्रम का। सभी प्राणियों को आत्मा में, फिर मुझमें देखना वही दो-चरणीय क्रम है जिस पर गीता बार-बार लौटती है: पहले निर्वैयक्तिक आधार, फिर उसके द्वारा व्यक्तिरूप प्रभु। यह गीता 6.29–गीता 6.30 की दृष्टि का पूर्वाभास देता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

yaj jñātvā na punar mohamयज् ज्ञात्वा न पुनः मोहं
जिसे जानकर तुम फिर मोह को प्राप्त नहीं होगे (yat + jñātvā + na + punaḥ + moham)
evaṃ yāsyasi pāṇḍavaएवं यास्यसि पाण्डव
इस प्रकार, हे पाण्डव (evam + yāsyasi + pāṇḍava)
yena bhūtāny aśeṣeṇaयेन भूतान्य् अशेषेण
जिससे समस्त प्राणियों को बिना किसी अपवाद के (yena + bhūtāni + aśeṣeṇa)
drakṣyasy ātmany atho mayiद्रक्ष्यस्य् आत्मन्य् अथो मयि
तुम आत्मा में और फिर मुझमें देखोगे (drakṣyasi + ātmani + atho + mayi)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The vision is given in a specific order — first ātmani, in the Self, and only then mayi, in Me — not the reverse. Whatever this knowledge is, it doesn’t route through Krishna first and arrive at the self as a byproduct; it discovers the self first, and finding Krishna there is what follows. The sequence matters as much as the destination: this isn’t devotion substituting for self-knowledge, it’s self-knowledge opening onto devotion.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप किसी लंबे समय से चली आ रही उलझन को सुलझाने की कोशिश कर रहे हों, तो पहले स्वयं को समझने का शांत काम किए बिना सीधे किसी बड़े बाहरी उत्तर — किसी उद्देश्य, किसी समुदाय, किसी रिश्ते — की ओर न दौड़ें; यह श्लोक दृष्टि को ठीक इसी क्रम में देता है: पहले आत्मा, फिर वह सब जो आत्मा के माध्यम से मिलता है।

व्यावसायिक

  • काम में अपनी दिशा की उलझन सुलझाने के लिए किसी मार्गदर्शक, कंपनी के मिशन या टीम की संस्कृति की ओर देखने से पहले, अपने मूल्यों और अपनी सोच को स्वयं स्पष्ट कर लें — बाहरी तालमेल आम तौर पर तब अधिक टिकता है जब वह ऐसी नींव पर बना हो जिसे आप सचमुच समझते हैं, न कि जब वह उस नींव की जगह ले लेता है।

परिवार और समाज

  • किसी रिश्ते से अपने भीतर की उलझन सुलझने की अपेक्षा करने से पहले, अपनी ज़रूरतों को समझने का शांत काम पहले करें — किसी और के साथ जुड़ाव आम तौर पर उस आत्म-समझ को गहरा करता है जो आपके पास पहले से है, न कि उसे बनाने के काम की जगह ले लेता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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