संस्कृत
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बद्ध्यते ॥
na māṃ karmāṇi limpanti na me karma-phale spṛhā iti māṃ yo 'bhijānāti karmabhir na sa baddhyate
अनुवाद
कर्म मुझे लिप्त नहीं करते, और न ही मुझे कर्मफल की कोई लालसा है। जो मुझे इस प्रकार जानता है, वह कर्मों से नहीं बँधता।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
कृष्ण श्लोक 13 के उस दावे को, कि वे कर्म किए बिना कर्ता हैं, एक सामान्य सिद्धांत तक बढ़ाते हैं: कर्म उनसे चिपकते नहीं और उन्हें उनके फल की कोई लालसा नहीं है, इसलिए जो कोई उनके बारे में यह बात सचमुच समझ लेता है, वह भी कर्म से नहीं बँधता। यह गीता 2.47 में कहा गया कर्म योग का मूल दावा है, जिसे अब कृष्ण के अपने स्वरूप के स्तर पर फिर से कहा गया है — अनासक्ति केवल एक अच्छा मनोवैज्ञानिक अभ्यास नहीं है, बल्कि परम कर्ता पहले से ही इसी तरह काम करता है। यहाँ तर्क अनुकरण का है: बंधनरहित कर्ता कैसे कर्म करता है — बिना किसी दाग के, फल की किसी लालसा के बिना — यह जानना ही उस तरह कर्म करने की शुरुआत है। इसीलिए अध्याय 4 बार-बार मुक्ति को सही ढंग से देखने का विषय बनाता है; आदर्श गीता 2.47 ही है, जिसे अब पूरी व्यवस्था के शिखर पर चलता हुआ दिखाया गया है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- na māṃ karmāṇi limpantiन मां कर्माणि लिंपन्ति
- कर्म मुझे लिप्त नहीं करते (na + mām + karmāṇi + limpanti)
- na me karma-phale spṛhāन मे कर्म-फले स्पृहा
- न मुझे कर्मफल की स्पृहा है (na + me + karma-phale + spṛhā)
- iti māṃ yo 'bhijānātiइति मां यो ऽभिजानाति
- जो मुझे इस प्रकार जानता है (iti + mām + yaḥ + abhijānāti)
- karmabhir na sa baddhyateकर्मभिः न स बद्ध्यते
- वह कर्मों से नहीं बँधता (karmabhiḥ + na + saḥ + badhyate)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The reasoning here runs backward from how moral instruction usually works. Rather than arguing non-attachment is virtuous and therefore worth practicing, Krishna grounds it in a claim about how reality’s ultimate agent already, factually, operates — an appeal to imitation of what is, not an appeal to what ought to be. Descriptive grounding for a prescriptive practice is a different kind of persuasion than moral argument.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- अनासक्ति को सद्गुण मानने के लिए ख़ुद से तर्क करने के बजाय, अपना रवैया उन लोगों जैसा बनाने की कोशिश करें जिन्हें आप सबसे शांत और सबसे सक्षम लोगों के रूप में जानते हैं, और देखें कि वे असल में कैसे काम करते हैं। जो चीज़ साफ़ तौर पर कारगर साबित हो चुकी है, उसकी नकल वहाँ भी आपको राज़ी कर सकती है जहाँ नैतिक तर्क अटक जाता है।
व्यावसायिक
- जब आप ब्लेमलेस पोस्टमॉर्टम (दोषारोपण-रहित समीक्षा) या साझा ज़िम्मेदारी जैसी किसी कार्यप्रणाली की पैरवी करें, तो दिखाएँ कि आपके सबसे प्रभावी नेता या टीमें पहले से ही इसी तरह काम करती हैं। यह कारगर है, इसका ऐसा वास्तविक प्रमाण अक्सर इस तर्क से ज़्यादा असर करता है कि यही करना सही है।
परिवार और समाज
- जब आप अपने किसी क़रीबी से किसी परिणाम पर अपनी पकड़ ढीली करने को कहें, तो अमूर्त ढंग से यह तर्क देने के बजाय कि यही ज़्यादा स्वस्थ रवैया है, किसी ऐसे व्यक्ति की ओर इशारा करना ज़्यादा मददगार हो सकता है जिसका वे सम्मान करते हैं और जो पहले से ही इसी तरह जीता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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