संस्कृत
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥
bahūni me vyatītāni janmāni tava cārjuna tāny ahaṃ veda sarvāṇi na tvaṃ vettha parantapa
अनुवाद
भगवान बोले — हे अर्जुन, मेरे और तुम्हारे बहुत-से जन्म बीत चुके हैं। हे परन्तप, उन सबको मैं जानता हूँ, पर तुम नहीं जानते।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
अर्जुन ने अभी जिस कालक्रम पर प्रश्न उठाया, उसका बचाव करने के बजाय कृष्ण इससे बड़ी बात कहते हैं: दोनों के अनेक जन्म हो चुके हैं, अंतर केवल इतना है कि कृष्ण को अपने सभी जन्म याद हैं, जबकि अर्जुन को अपना एक भी याद नहीं। यह अध्याय 2 (श्लोक 2.13, 2.22) का पुनर्जन्म का सिद्धांत है, जिसे यहाँ विशेष रूप से कृष्ण पर लागू किया गया है, और यह श्लोक 4 की आपत्ति का चुपचाप उत्तर देता है, यह कहकर कि “जन्म” उन्हें उस तरह नहीं बाँधता जैसे अर्जुन को बाँधता है। भेद का चिह्न जन्मों के पार स्मृति है, उनसे मुक्ति नहीं — कृष्ण की जागरूकता की निरंतरता ही उनके “जन्मों” को स्वरूप से भिन्न बनाती है। अध्याय 2 का आत्मा वाला तर्क यहाँ असमान हो जाता है: चक्र वही है, पर उससे संबंध भिन्न।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- bahūni me vyatītāni janmāniबहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि
- मेरे बहुत-से जन्म बीत चुके हैं (bahūni + me + vyatītāni + janmāni)
- tava cārjunaतव चार्जुन
- और तुम्हारे भी, हे अर्जुन (tava + ca + arjuna)
- tāny ahaṃ veda sarvāṇiतान्य् अहं वेद सर्वाणि
- उन सबको मैं जानता हूँ (tāni + aham + veda + sarvāṇi)
- na tvaṃ vettha parantapaन त्वं वेत्थ परन्तप
- तुम नहीं जानते, हे परन्तप (na + tvam + vettha + parantapa)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Krishna doesn’t actually answer the question Arjuna asked — whether he really taught Vivasvân in the past — he answers a bigger question instead, about the nature of birth and memory generally. That’s a distinct rhetorical move from verse 2’s careful genealogy-building: rather than litigate the specific chronological detail, he steps back and reframes the premise the objection was standing on.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब कोई आपको किसी एक विशेष बात पर चुनौती दे, तो सोचिए कि क्या बेहतर उत्तर यह होगा कि आप एक कदम पीछे हटकर उसके नीचे छिपी बड़ी मूल धारणा को नए ढंग से रखें, बजाय इसके कि उसी एक बात पर उसकी अपनी शर्तों पर बहस करते रहें।
व्यावसायिक
- जब कोई हितधारक आपकी योजना में कोई छोटी-सी असंगति बताए, तो स्वयं से पूछिए कि असली सुधार उस एक बात को ठीक कर देना है या उस बुनियादी ढाँचे पर फिर से विचार करना है जिससे वह पैदा हुई — कभी-कभी वह बात केवल एक लक्षण होती है, असली समस्या नहीं।
परिवार और समाज
- जब कोई किसी विशेष बात की शिकायत करे, तो उस एक घटना से आगे देखिए और उस बड़े ढर्रे को पहचानिए जिसकी ओर वह इशारा कर रही है — केवल उस बात का उत्तर देने से असली समस्या जस की तस रह सकती है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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