4.22

संस्कृत

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः । समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वाऽपि न निबद्ध्यते ॥

yadṛcchā-lābha-santuṣṭo dvandvātīto vimatsaraḥ samaḥ siddhāv asiddhau ca kṛtvāpi na nibaddhyate

अनुवाद

जो बिना चाहे अपने-आप मिल जाए, उसी में संतुष्ट रहने वाला, द्वन्द्वों से परे, ईर्ष्या से रहित और सफलता तथा असफलता में सम रहने वाला मनुष्य कर्म करते हुए भी बँधता नहीं।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह श्लोक समभाव के पारंपरिक लक्षणों के साथ उस चित्रण को आगे बढ़ाता है — बिना माँगे जो कुछ भी मिल जाए उसी में संतुष्ट, द्वंद्वों से परे, ईर्ष्या से मुक्त, सफलता और असफलता में सम — ऐसी भाषा जो 2.48 के “समत्वं योग उच्यते” को लगभग हूबहू दोहराती है। अध्याय 2 ने इस आदर्श को चेतना के स्तर पर स्थापित किया था; यहाँ वही व्यक्ति विशेष रूप से कर्म करने के संदर्भ में रखा गया है। मूल पाठ में अंतिम शब्द में छपाई का एक सुधार अंकित है (निबध्यते को सुधारकर निबद्ध्यते), जिसे ऊपर अपनाया गया है। यदृच्छालाभसन्तुष्ट — “जो अपने-आप आ जाए उसी में संतुष्ट” — समत्व का व्यावहारिक रूप है: यह परिणामों के प्रति उदासीनता नहीं, बल्कि इस बात पर पकड़ का न होना है कि कौन-सा परिणाम आता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

yadṛcchā-lābha-santuṣṭoयदृच्छा-लाभ-सन्तुष्टो
अपने-आप जो मिल जाए उसी में संतुष्ट (yadṛcchā-lābha-santuṣṭaḥ)
dvandvātītoद्वन्द्वातीतो
द्वन्द्वों से परे (dvandva-atītaḥ)
vimatsaraḥविमत्सरः
ईर्ष्या से रहित
samaḥ siddhāv asiddhau caसमः सिद्धाव् असिद्धौ च
सफलता और असफलता में समान (samaḥ + siddhau + asiddhau + ca)
kṛtvāpi na nibaddhyateकृत्वापि न निबद्ध्यते
कर्म करके भी नहीं बँधता (kṛtvā + api + na + nibadhyate)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

yadṛcchā-lābha, “gain that arrives unsought,” is a narrower test than it first sounds — it says nothing about how hard someone works or what they pursue, only about how they receive whatever lands in front of them. The discipline this verse describes lives entirely on the receiving end, not the effort end, which is a version of equanimity easy to skip past because it asks nothing of your ambition, only of your reaction to how the outcome actually turns out.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • ध्यान दें कि यह श्लोक आपसे चीज़ों की इच्छा करना या उनके लिए काम करना छोड़ने को नहीं कहता — यह केवल इतना पूछता है कि जो कुछ वास्तव में आपके हाथ आता है, चाहा हुआ हो या अनचाहा, उसे आप कैसे ग्रहण करते हैं। जब कोई ऐसा परिणाम सामने आए जिसे आपने स्वयं नहीं रचा था, तब संतुलित बने रहने का अभ्यास करें, बजाय किसी बड़े त्याग की प्रतीक्षा करने के, जिस तक आप शायद कभी पहुँच ही न पाएँ।

व्यावसायिक

  • जब कोई परियोजना आंशिक रूप से ऐसी परिस्थितियों के कारण सफल होती है जिन्हें आपने नहीं बनाया — बाज़ार में कोई बदलाव, किसी सहकर्मी की मदद, या बस सही समय — तो न तो ज़रूरत से ज़्यादा श्रेय लेने की इच्छा के आगे झुकें और न ही अपराध-बोध के कारण उस सफलता को छोटा करके दिखाएँ; उसे उसी समभाव से ग्रहण करें, जिस तरह आप किसी अनपेक्षित असफलता को ग्रहण करना चाहेंगे।

परिवार और समाज

  • जब पारिवारिक परिस्थितियाँ आपको कुछ ऐसा सौंप दें जो आपने माँगा नहीं था — कोई विरासत, कोई उपकार, कोई अनपेक्षित अवसर — तो आप उसे कैसे ग्रहण करते हैं, यह आपके चरित्र के बारे में उससे कहीं अधिक बताता है कि आपने उसके लिए कितनी मेहनत की; उसे न अपराध-बोध के साथ और न ही अधिकार-भाव के साथ स्वीकार करने का अभ्यास करें।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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