4.1

संस्कृत

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥

imaṃ vivasvate yogaṃ proktavān aham avyayam vivasvān manave prāha manur ikṣvākave 'bravīt

अनुवाद

यह अविनाशी योग मैंने विवस्वान् को बताया था; विवस्वान् ने इसे मनु से कहा और मनु ने इक्ष्वाकु को इसका उपदेश दिया।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

अध्याय 4 एक ऐसे दावे से शुरू होता है जो दो श्लोक बाद अर्जुन की चुनौती को जन्म देगा: यह योग अविनाशी है, और कृष्ण ने इसे बहुत पहले सिखाया था, और यह सूर्यदेव विवस्वान् से मनु और मनु से इक्ष्वाकु तक पहुँचा। यह अध्याय 3 में कर्म योग के पक्ष में दिए गए व्यावहारिक तर्क से जान-बूझकर आगे बढ़ा हुआ कदम है, जो अब स्वयं इस उपदेश की प्राचीनता और प्रामाणिकता का दावा करता है, और उस सिद्धांत की नींव रखता है कि दिव्य ज्ञान समय-समय पर आगे सौंपा जाता है — यह सिद्धांत पूरे अध्याय में चलता है। यहाँ जिस परम्परा का नाम लिया गया है — विवस्वान्, मनु, इक्ष्वाकु — वह सूर्य-वंश की राजवंशावली है, जो इस उपदेश को पुरोहिताई से नहीं, बल्कि राजत्व से जोड़ती है। अध्याय पृष्ठ पर दिया गया चित्र इस शृंखला को उस आरंभ से अर्जुन तक दर्शाता है, उस विराम से होते हुए जहाँ यह लुप्त हो गई थी, और गीता 4.34 पर इसके पुनः आरंभ तक।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

imaṃइमं
इस
vivasvateविवस्वते
सूर्यदेव विवस्वान को
yogaṃयोगं
योग को
proktavān ahamप्रोक्तवान् अहं
मैंने कहा था (proktavān + aham)
avyayamअव्ययं
अविनाशी
vivasvānविवस्वान्
विवस्वान ने
manaveमनवे
मनु को
prāhaप्राह
बताया
manurमनुः
मनु ने
ikṣvākaveइक्ष्वाकवे
इक्ष्वाकु को
'bravītऽब्रवीत्
कहा (abravīt)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

There’s a quiet tension in opening a chapter this way: Krishna calls the yoga “imperishable” in the very same breath that sets up its transmission chain, a chain the next verse will admit has since broken. Claiming permanence for a teaching and then immediately conceding it was lost aren’t contradictory here — they’re the chapter’s whole premise — but it’s worth noticing that “imperishable” describes the teaching’s truth, not its unbroken survival in the world.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • किसी मूल्य या अनुशासन का सिद्धांत रूप में 'अविनाशी' होना यह नहीं दर्शाता कि वह बिना देखभाल के आपके जीवन में बना रहेगा — किसी अभ्यास का सत्य होना और उसका सचमुच जारी रहना, ये दो अलग बातें हैं, और इनमें से केवल एक ही अपने आप सुरक्षित रहती है।

व्यावसायिक

  • कोई ठोस प्रक्रिया या संस्था का कोई ज्ञान पूरी तरह सही होते हुए भी उपयोग न होने से या लोगों के बदलते रहने से क्षीण हो सकता है — यह मानकर न चलें कि जो चीज़ शुरू करते समय सही थी, उसका पालन आज भी हो रहा है।

परिवार और समाज

  • जिस पारिवारिक मूल्य को आप शाश्वत मानते हैं, उसे भी हर पीढ़ी में कोई ऐसा व्यक्ति चाहिए जो सक्रिय रूप से उसे आगे सौंपे — उसे स्थायी कह देना उसे आगे पहुँचाने के परिश्रम का स्थान नहीं ले सकता।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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