संस्कृत
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥
yasya sarve samārambhāḥ kāma-saṅkalpa-varjitāḥ jñānāgni-dagdha-karmāṇaṃ tam āhuḥ paṇḍitaṃ budhāḥ
अनुवाद
जिसके सभी कार्य काम और संकल्प से रहित हैं, और जिसके कर्म ज्ञान की अग्नि में जलकर भस्म हो गए हैं, उसे ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह श्लोक उस व्यक्ति का वर्णन करता है जिसने श्लोक 18 के विरोधाभास को सुलझा लिया है: ऐसे कार्य जो इच्छा के आकार देने वाले प्रभाव से मुक्त हैं, और ऐसे कर्म जो “ज्ञान की अग्नि से जल गए हैं”। श्लोक 10 में आया अग्नि का रूपक यहाँ एक स्पष्ट प्रक्रिया बन जाता है — ज्ञान कर्म को होने से नहीं रोकता, बल्कि उस कार्मिक अवशेष को भस्म कर देता है जो कर्म से अन्यथा उत्पन्न होता, और ठीक इसी प्रक्रिया पर अध्याय के अंत में श्लोक 37-38 फिर लौटेंगे। काम-संकल्प — “इच्छा और उससे बनने वाला संकल्प” — उस चीज़ का नाम है जिसका न होना आवश्यक है: कर्म का नहीं, बल्कि उस चाह का जो उसे आकार देती है। उसे हटा दें, तो गीता 4.37 कहती है कि ज्ञान की अग्नि पिछले कर्मों को भी भस्म कर देती है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- yasya sarve samārambhāḥयस्य सर्वे समारंभाः
- जिसके सभी कार्यारम्भ (yasya + sarve + samārambhāḥ)
- kāma-saṅkalpa-varjitāḥकाम-सङ्कल्प-वर्जिताः
- काम और संकल्प से रहित हैं (kāma-saṅkalpa-varjitāḥ)
- jñānāgni-dagdha-karmāṇaṃज्ञानाग्नि-दग्ध-कर्माणं
- ज्ञान की अग्नि से जिसके कर्म जल गए हैं (jñāna-agni-dagdha-karmāṇam)
- tam āhuḥ paṇḍitaṃ budhāḥतं आहुः पण्डितं बुधाः
- उसे ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं (tam + āhuḥ + paṇḍitam + budhāḥ)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
“Paṇḍita” ordinarily connotes scholarly or priestly learning, but here the word is redefined by a purely motivational criterion: freedom from desire’s shaping influence on action, nothing about credentials or accumulated knowledge. The Gita is quietly relocating what counts as wisdom away from the conventional markers the word itself usually implies.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- सच में ज्ञानी या कुशल होना इस बात से नहीं मापा जाता कि आपके पास कौन-सी उपाधियाँ हैं या आप कितना जानते हैं, बल्कि इस बात से कि क्या लालसा अब भी आपके कर्मों को आकार देती है — जिसके पास उपाधियाँ कम हों, पर जिसके कर्म लालसा से कम प्रेरित हों, वह सच्चे ज्ञान के अधिक निकट हो सकता है।
व्यावसायिक
- कमरे में सबसे ऊँचे पद वाला व्यक्ति अपने-आप वह व्यक्ति नहीं बन जाता जिस पर किसी निर्णय के लिए भरोसा किया जाए — यह देखें कि किसके कर्म परिणाम से जुड़े निजी स्वार्थ से सबसे कम प्रभावित होते हैं, क्योंकि अक्सर वही सही विवेक का अधिक भरोसेमंद संकेत होता है।
परिवार और समाज
- परिवार में सम्मान अपने-आप उसी को नहीं मिलना चाहिए जो कागज़ पर सबसे अधिक सफल हो — इसके बजाय ध्यान दें कि किसके कर्म स्वार्थ से सबसे कम प्रेरित हैं; यह इस बात का बेहतर पैमाना है कि वास्तव में भरोसे के योग्य कौन है।
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