संस्कृत
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥
sarvāṇīndriya-karmāṇi prāṇa-karmāṇi cāpare ātma-saṃyama-yogāgnau juhvati jñāna-dīpite
अनुवाद
कुछ अन्य लोग इन्द्रियों के सभी कर्मों और प्राण के कर्मों को ज्ञान से प्रज्वलित आत्मसंयम रूपी योग की अग्नि में आहुति के रूप में अर्पित करते हैं।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह श्लोक सूची को एक अधिक समन्वित रूप के साथ आगे बढ़ाता है: इन्द्रियों और प्राणवायु के सभी कार्यों को ज्ञान से प्रज्वलित आत्मसंयम की एक ही अग्नि में अर्पित करना — और फिर से श्लोक 10 और 19 की ज्ञान-अग्नि की छवि को सीधे यज्ञ की शब्दावली से जोड़ता है। जहाँ श्लोक 26 ने आहुति को अनेक अग्नियों में बाँटा था, वहाँ यह श्लोक उसे एक में समेट देता है: एक ही आत्मसंयमयोगाग्नि, जो ज्ञान से प्रज्वलित है। ऐसी अग्नि की छवि, जिसे ज्ञान से प्रज्वलित करना पड़ता है, इस अध्याय का यह कहने का तरीका है कि समझ के बिना अनुशासन जलता नहीं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- sarvāṇīndriya-karmāṇiसर्वाणीन्द्रिय-कर्माणि
- इन्द्रियों के सभी कर्म (sarvāṇi + indriya-karmāṇi)
- prāṇa-karmāṇi cāpareप्राण-कर्माणि चापरे
- और प्राणों के कर्म, दूसरे लोग (prāṇa-karmāṇi + ca + apare)
- ātma-saṃyama-yogāgnauआत्म-संयम-योगाग्नौ
- आत्मसंयम रूपी योग की अग्नि में (ātma-saṃyama-yoga-agnau)
- juhvatiजुह्वति
- आहुति देते हैं
- jñāna-dīpiteज्ञान-दीपिते
- ज्ञान से प्रज्वलित (jñāna-dīpite)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Verse 26 kept two techniques apart — restraining the senses, or engaging sense-objects with discipline; this verse folds both together into a single more integrated offering, all sensory and vital function poured into one fire kindled by knowledge. The catalogue isn’t just listing parallel options, it’s quietly escalating in sophistication verse by verse, moving from separable techniques toward a more unified practice — a shape worth noticing before assuming every item in this list carries equal weight.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- यदि आप इस समय कई अलग-अलग छोटे अनुशासनों का अभ्यास कर रहे हैं — एक आदत एकाग्रता के लिए, दूसरी धैर्य के लिए, तीसरी संयम के लिए — तो यह अपेक्षा रखिए कि पर्याप्त अभ्यास के साथ वे धीरे-धीरे मिलकर जीने और काम करने का एक ही एकीकृत ढंग बनने लगेंगी, ठीक वैसे ही जैसे यह श्लोक इन्द्रियों और उनके विषयों को एक ही आहुति में मिला देता है।
व्यावसायिक
- किसी क्षमता को विकसित करने के आरंभ में, आप संभवतः अलग-अलग कौशलों का अभ्यास अलग-अलग करेंगे — एक संवाद के लिए, एक तकनीकी गहराई के लिए, एक विवेकपूर्ण निर्णय के लिए; उस क्षमता का अधिक एकीकृत रूप, जिसकी ओर बढ़ना सार्थक है, तब आता है जब उन कौशलों को अलग-अलग सँभालना बंद हो जाता है और वे एक सुसंगत अभ्यास के रूप में काम करने लगते हैं।
परिवार और समाज
- किसी संबंध में आप जो अलग-अलग छोटे प्रयास करते हैं — बेहतर ढंग से सुनना, अधिक धैर्य रखना, अधिक भरोसेमंद ढंग से साथ निभाना — उनका उद्देश्य यह है कि वे अंततः उस व्यक्ति के साथ रहने के एक सुसंगत ढंग में घुल-मिल जाएँ, न कि हमेशा अलग-अलग आदतों की एक सूची बने रहें जिसका हिसाब रखना पड़े।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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