4.42

संस्कृत

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः । छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥

tasmād ajñāna-sambhūtaṃ hṛt-sthaṃ jñānāsinātmanaḥ chittvainaṃ saṃśayaṃ yogam ātiṣṭhottiṣṭha bhārata

अनुवाद

इसलिए, हे भारत, अपने हृदय में बसे इस अज्ञान से उत्पन्न संशय को आत्मज्ञान की तलवार से काटकर योग में स्थित हो जाओ और उठो।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

अध्याय का समापन-आदेश उस ढाँचे को पूरा करता है जो बहुत पहले अध्याय 1 में खुला था: हृदय में बैठे इस अज्ञान से उत्पन्न संशय को आत्मज्ञान की तलवार से काट डालो, योग में स्थित हो जाओ, और खड़े हो जाओ — उत्तिष्ठ, उठने का वही आह्वान जो कृष्ण ने 2.3 में अधिक दो-टूक ढंग से दिया था, पर अब वह केवल घोषित नहीं किया गया, बल्कि चार अध्यायों के तर्क से अर्जित है। युद्धभूमि पर अर्जुन के संशय और शोक में ढह जाने से जो आरंभ हुआ था, उसका उत्तर यहाँ एक विशिष्ट साधन से दिया गया है — ज्ञान, जिसे एक शस्त्र के रूप में चित्रित किया गया है — न कि ऐसा अनुभव करना बंद कर देने के किसी कोरे आदेश से। काव्य का तीसरा उत्तिष्ठ (गीता 2.3 और गीता 2.37 के बाद) वह है जिसके साथ एक औज़ार जुड़ा है: संशय के विरुद्ध ज्ञान की तलवार, उस संशय के विरुद्ध जो हृदय में बैठा है — ठीक वही स्थान जहाँ अध्याय 1 में अर्जुन ढह गए थे।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

tasmād ajñāna-sambhūtaṃतस्माद् अज्ञान-संभूतं
इसलिए, अज्ञान से उत्पन्न (tasmāt + ajñāna-sambhūtam)
hṛt-sthaṃ jñānāsinātmanaḥहृत्-स्थं ज्ञानासिनात्मनः
हृदय में स्थित, आत्मा के ज्ञान रूपी तलवार से (hṛt-stham + jñāna-asinā + ātmanaḥ)
chittvainaṃ saṃśayaṃछित्त्वैनं संशयं
इस संशय को काटकर (chittvā + enam + saṃśayam)
yogam ātiṣṭhottiṣṭha bhārataयोगं आतिष्ठोत्तिष्ठ भारत
योग में स्थित हो जाओ, उठो, हे भारत (yogam + ātiṣṭha + uttiṣṭha + bhārata)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Verse 33 said all action culminates in knowledge; this closing verse reverses the direction — the knowledge just spent four chapters establishing culminates in a command to act, uttiṣṭha, stand up. The chapter doesn’t end on a statement of fact for Arjuna to accept, it ends on an imperative aimed at his feet. That reversal is easy to miss if you read the two verses in isolation: action feeds into knowledge, and knowledge feeds right back out into action, with nothing in the loop meant to be a permanent resting place.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • अपने बारे में मिली अंतर्दृष्टि को रुकने की जगह न बनने दें — यह अध्याय अपनी पूरी शक्ति समझ बनाने में लगाता है, पर इसका अंत उठकर कर्म करने के आदेश पर होता है, किसी ऐसे सारांश पर नहीं जिससे मन संतुष्ट होकर बैठ जाए। यदि स्पष्टता का कोई क्षण किसी अगले कदम में नहीं बदला है, तो उसे अधूरा मानें, पूरा नहीं।

व्यावसायिक

  • जब किसी रणनीति बैठक या मूल-कारण विश्लेषण से सचमुच स्पष्टता मिले, तो उस स्पष्टता को ही अंतिम परिणाम न बनने दें — उसे सोच-समझकर किसी ठोस अगले कदम तक ले जाएँ, ठीक वैसे ही जैसे इस अध्याय का तर्क किसी निष्कर्ष पर नहीं, बल्कि कर्म करने के आदेश पर जाकर पूरा होता है।

परिवार और समाज

  • किसी विवाद में क्या गलत हुआ, यह जब आप सचमुच समझ लें — वास्तव में समझ लें, केवल माफ़ी न माँगें — तो उसे व्यवहार में सचमुच के बदलाव तक ले जाएँ; जो समझ 'अब मैं समझ गया' पर रुक जाती है और जिसके साथ कोई अगला कदम नहीं जुड़ा, उसने वह काम पूरा नहीं किया जिसका वर्णन यह श्लोक करता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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