4.31

संस्कृत

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् । नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥

yajña-śiṣṭāmṛta-bhujo yānti brahma sanātanam nāyaṃ loko 'sty ayajñasya kuto 'nyaḥ kuru-sattama

अनुवाद

हे कुरुश्रेष्ठ, यज्ञ से बचे हुए अमृत का भोग करने वाले सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। जो यज्ञ नहीं करता, उसके लिए यह लोक भी नहीं है, फिर दूसरा लोक कैसे होगा।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

व्याख्या

अमृत — यानी आहुति दे चुकने के बाद बचा हुआ पवित्र अवशेष — ग्रहण करके यज्ञ करने वाला अपरिवर्तनशील ब्रह्म की ओर बढ़ता है; इसके विपरीत, जो कभी यज्ञ करता ही नहीं, वह केवल मुक्ति ही नहीं, यह लोक भी खो देता है। दूसरा अंश अधिक तीखा दावा है: बात केवल इतनी नहीं कि यज्ञ न करने से अच्छा परलोक नहीं मिलता, बल्कि इससे जीने लायक वर्तमान भी छिन जाता है। यह यज्ञ को — उस बहुत व्यापक अर्थ में जो पिछले कई श्लोकों ने गढ़ा है — अच्छी तरह जीने की ही बुनियादी व्यवस्था मानता है, न कि अगले जन्म के लिए रखा गया कोई वैकल्पिक आध्यात्मिक उन्नयन। यह वाक्यांश गीता 3.13 के “यज्ञ के शेष को खाने वाले” को दोहराता है और उसे और आगे ले जाता है: न अयं लोकः — केवल लेते रहने वाला जीवन इस लोक का भी अच्छा जीवन नहीं है। यज्ञ को एक सुसंगत अस्तित्व की शर्त के रूप में प्रस्तुत किया गया है, उसके पुरस्कार के रूप में नहीं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

yajña-śiṣṭāmṛta-bhujoयज्ञ-शिष्टामृत-भुजो
यज्ञ से बचे अमृत का भोग करने वाले (yajña-śiṣṭa-amṛta-bhujaḥ)
yānti brahma sanātanamयान्ति ब्रह्म सनातनं
सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं (yānti + brahma + sanātanam)
nāyaṃ loko 'sty ayajñasyaनायं लोको ऽस्त्य् अयज्ञस्य
यज्ञ न करने वाले के लिए यह लोक नहीं है (na + ayam + lokaḥ + asti + ayajñasya)
kuto 'nyaḥ kuru-sattamaकुतो ऽन्यः कुरु-सत्तम
फिर दूसरा लोक कैसे, हे कुरुश्रेष्ठ (kutaḥ + anyaḥ + kuru-sattama)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

टीका

Site Commentary

The line reads as a general principle about sacrifice and the cosmos, until the last word, kuru-sattama, “best of the Kurus,” turns it back into something Krishna is saying directly to Arjuna, standing on an actual battlefield. Nothing else in the verse needed the address; the teaching would have worked as pure abstraction. The vocative is the sentence’s reminder that abstraction was never really the point — a general truth is being aimed, deliberately, at one specific person’s specific hesitation.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

इस श्लोक को अपनाएँ

पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप स्वयं से जीवन का कोई सामान्य सिद्धांत कहते हैं — 'निरंतर बने रहो', 'हार मत मानो' — तो उसे अपने सामने खड़े वास्तविक निर्णय से स्पष्ट रूप से जोड़ें, न कि उसे एक ऐसी अमूर्त बात बनाकर छोड़ दें जिससे आप सिद्धांत रूप में सहमत हैं; आपकी विशेष परिस्थिति पर साधा गया सत्य उसी सत्य से कहीं अधिक काम करता है जिसे सामान्य ही छोड़ दिया गया हो।

व्यावसायिक

  • जब आप अपनी टीम के सामने कोई सामान्य नीति या सिद्धांत रखें, तो उस विशेष स्थिति का नाम लें जिसके लिए वह है, न कि उसे एक ऐसे अमूर्त कथन के रूप में छोड़ दें जिस पर सब बस सिर हिला दें; वही शब्द बिल्कुल अलग असर करते हैं जब किसी को यह समझ आ जाए कि वे उसके वास्तविक, वर्तमान निर्णय को लक्ष्य करके कहे गए थे।

परिवार और समाज

  • जब आप किसी ऐसे निकट व्यक्ति को, जो कठिनाई से जूझ रहा है, कोई सामान्य ज्ञान की बात कहें, तो उसे सामान्य सलाह की तरह देने के बजाय उसकी विशेष परिस्थिति से स्पष्ट रूप से जोड़ें — उसकी वास्तविक स्थिति को संबोधित करते हुए कहे गए वही शब्द ऐसा वज़न रखते हैं जो अमूर्त रूप कभी नहीं रख सकता।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

स्वयं से पूछें

इस श्लोक को पढ़ने से आगे ले जाने के कुछ तरीके। टिक और नोट इसी ब्राउज़र में रहते हैं।

इस श्लोक पर चिंतन करें

    ← 4.30अध्याय 4 · 42 में से 314.32 →
    श्लोक पर जाएँ