संस्कृत
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥
praśāntātmā vigatabhīr brahmacārivrate sthitaḥ manaḥ saṃyamya maccitto yukta āsīta matparaḥ
अनुवाद
प्रशान्त चित्त वाला, भय से मुक्त और ब्रह्मचर्य के व्रत में दृढ़ रहकर, वह मन को संयम में रखे, मुझमें चित्त लगाए और मुझे ही परम लक्ष्य मानते हुए योगयुक्त होकर बैठे।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यहाँ निर्देश आसन से हटकर ध्यान के विषय पर आ जाता है: मन को विशेष रूप से कृष्ण पर ही टिकाना है (मच्चित्तः, मत्परः — “मुझमें” मन लगाए हुए, “मुझमें” परायण)। ध्यान के क्रम में यह पहला स्थान है जहाँ अभ्यास सामान्य आत्म-अनुशासन नहीं रह जाता और स्पष्ट रूप से ईश्वर-केन्द्रित हो जाता है। इसमें उस भक्तिपरक मोड़ का पूर्वाभास है जिसे गीता अध्याय 7 से आगे और पूरी तरह अपनाती है। मच्चित्त, मत्पर — मन मुझमें, लक्ष्य मैं — यह वही आधार है जिसका उल्लेख गीता 2.61 में एक बार चलते-चलते हुआ था; यहाँ यह ध्यान का वास्तविक विषय बन जाता है, और एक पूर्ण मार्ग के रूप में भक्ति का बीज भी।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- praśāntātmāप्रशान्तात्मा
- शान्त अन्तःकरण वाला (praśānta-ātmā)
- vigatabhīrविगतभीः
- भय से रहित (vigata-bhīḥ)
- brahmacārivrate sthitaḥब्रह्मचारिव्रते स्थितः
- ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित (brahmacāri-vrate + sthitaḥ)
- manaḥ saṃyamya maccittoमनः संयंय मच्चित्तो
- मन को संयमित करके, मुझमें चित्त लगाए हुए (manaḥ + saṃyamya + mat-cittaḥ)
- yukta āsīta matparaḥयुक्त आसीत मत्परः
- युक्त होकर, मेरे परायण होकर बैठे (yuktaḥ + āsīta + mat-paraḥ)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Every instruction up to this point has been about the practitioner’s own internal state — posture, gaze, restrained mind. This verse is the hinge: for the first time the object of focus is specified as something outside the self entirely. Self-discipline alone, the verse implies, needs somewhere to point once it’s achieved — an object, not just an emptied mind.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- एक शांत, अनुशासित मन आवश्यक है, पर पर्याप्त नहीं। जब आप उसे स्थिर कर लें, तो उसे कोई ऐसी चीज़ दें जिसकी ओर उसे लगाना सार्थक हो, चाहे वह कोई मूल्य हो, कोई व्यक्ति हो या कोई उद्देश्य। बिना किसी लक्ष्य की स्थिरता प्रायः टिकती नहीं।
व्यावसायिक
- गहराई से ध्यान केंद्रित करने का अनुशासन बना लेने के बाद उस क्षमता को दिशाहीन न छोड़ें। अपनी एकाग्रता की क्षमता को सराहते रहने के बजाय उसे किसी ऐसी चीज़ में लगाएँ जो इस निवेश के योग्य हो, जैसे कोई मिशन या कोई कौशल जिसकी आपको सचमुच परवाह है।
परिवार और समाज
- अपने भीतर भावनात्मक स्थिरता लाना आधा ही काम है। जब वह आ जाए, तो स्थिरता को ही अंतिम लक्ष्य मानने के बजाय उसे उन लोगों की ओर मोड़ें जिन्हें आपके शांत ध्यान की ज़रूरत है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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