संस्कृत
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्त्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥
sarvabhūtasthitaṃ yo māṃ bhajaty ekatvam āsthitaḥ sarvathā vartamāno'pi sa yogī mayi vartate
अनुवाद
जो एकत्व में स्थित होकर सब प्राणियों में स्थित मुझे भजता है, वह योगी चाहे जिस प्रकार भी रहता हो, मुझमें ही रहता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह श्लोक एक महत्वपूर्ण छूट देता है, जिसे श्लोक 10–17 के तपस्वी-जैसे लगने वाले निर्देश मानो नकारते प्रतीत हो सकते हैं: जीवन की बाहरी परिस्थितियाँ — “चाहे वह किसी भी प्रकार रहता हो” — उस एकत्व की दृष्टि से उपासना करने वाले व्यक्ति को अयोग्य नहीं ठहरातीं। पाठ जिस पर नज़र रखे हुए है, वह भीतरी अवस्था है, जीवन का बाहरी रूप नहीं। सर्वथा वर्तमानोऽपि — “वह जिस किसी भी प्रकार रहता हो” — उस द्वार को फिर से खोल देता है जिसे ध्यान वाला खंड संकरा करता प्रतीत हुआ था: एकत्व में स्थित भक्त के लिए वन में रहने वाला एकांतवासी होना आवश्यक नहीं है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- sarvabhūtasthitaṃ yo māṃसर्वभूतस्थितं यो मां
- सब प्राणियों में स्थित मुझको, जो (sarva-bhūta-sthitam + yaḥ + mām)
- bhajaty ekatvam āsthitaḥभजत्य् एकत्वं आस्थितः
- एकत्व में स्थित होकर भजता है (bhajati + ekatvam + āsthitaḥ)
- sarvathā vartamāno'piसर्वथा वर्तमानोऽपि
- सब प्रकार से बरतता हुआ भी (sarvathā + vartamānaḥ + api)
- sa yogī mayi vartateस योगी मयि वर्तते
- वह योगी मुझमें रहता है (saḥ + yogī + mayi + vartate)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
This verse quietly forecloses a misreading the earlier instructions (solitary seat, regulated diet, withdrawal of the senses) could easily invite — that this discipline is only for renunciates. By insisting “whatever his mode of living,” Krishna decouples the inner unity from any particular external form of life, protecting the teaching from being mistaken for a lifestyle prescription rather than an inner one.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- यह मानकर न चलें कि किसी आंतरिक अनुशासन के जड़ पकड़ने से पहले आपको अपनी बाहरी परिस्थितियों को पूरी तरह बदलना होगा — नौकरी छोड़नी होगी, कहीं और जाकर बसना होगा, अपनी पूरी दिनचर्या बदलनी होगी। यह श्लोक ज़ोर देकर कहता है कि देखा आंतरिक अवस्था को जाता है, उस बाहरी रूप को नहीं जो आपके जीवन ने संयोग से ले रखा है।
व्यावसायिक
- काम पर स्थिरता का अभ्यास करने के लिए आपको बिल्कुल अलग करियर या भूमिका की ज़रूरत नहीं है — दबाव में भी केंद्रित रहने का अनुशासन उसी काम के भीतर उपलब्ध है जो आप अभी कर रहे हैं; यह इस पर निर्भर नहीं कि पहले आपको 'सही' बाहरी परिस्थितियाँ मिल जाएँ।
परिवार और समाज
- आपका पारिवारिक या सामाजिक जीवन अभी जो भी रूप लिए हुए हो — व्यस्त, अपूर्ण, लीक से हटकर — उसके भीतर अपनी आंतरिक स्थिरता पर काम करने से पहले आपको उसका ढाँचा ठीक करने की ज़रूरत नहीं है। बाहरी व्यवस्था चाहे जैसी हो, आंतरिक अभ्यास आपके साथ-साथ चलता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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