संस्कृत
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥
yadā hi nendriyārtheṣu na karmasv anuṣajjate sarvasaṅkalpasaṃnyāsī yogārūḍhas tadocyate
अनुवाद
जब मनुष्य न इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होता है और न कर्मों में, तब सभी संकल्पों का संन्यास करने वाला वह योगारूढ़ कहा जाता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह श्लोक 3 में बताई गई “आरूढ़” (योगारूढ़) अवस्था को परिभाषित करता है: इन्द्रियों के विषयों और स्वयं कर्मों, दोनों के प्रति अनासक्ति, और साथ ही श्लोक 2 में बताया गया संकल्प का त्याग। ये तीनों, यानी विषय, कर्म और उनके इर्द-गिर्द योजना बनाने वाली इच्छा, उन सब चीज़ों की पूरी सूची हैं जिन्हें केवल रोकना नहीं, बल्कि छोड़ना है। यह सूची जान-बूझकर पूर्ण रखी गई है: इन्द्रियार्थ (जो खींचता है), कर्म (करना), संकल्प (उसके पीछे की चाह)। गीता 6.18 ध्यान वाले खंड की शब्दावली में इसी अवस्था को फिर से कहता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- yadā hi nendriyārtheṣuयदा हि नेन्द्रियार्थेषु
- जब निश्चय ही इन्द्रियों के विषयों में नहीं (yadā + hi + na + indriya-artheṣu)
- na karmasv anuṣajjateन कर्मस्व् अनुषज्जते
- न कर्मों में आसक्त होता है (na + karmasu + anuṣajjate)
- sarvasaṅkalpasaṃnyāsīसर्वसङ्कल्पसंन्यासी
- सभी संकल्पों का संन्यास करने वाला (sarva-saṅkalpa-saṃnyāsī)
- yogārūḍhas tadocyateयोगारूढस् तदोच्यते
- तब वह योगारूढ़ कहलाता है (yoga-ārūḍhaḥ + tadā + ucyate)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Notice the verb Krishna doesn’t use: not restrained, suppressed, or managed — released. Non-attachment here isn’t a tighter grip held very carefully, it’s the grip actually opening. A list of three things (objects, actions, the will around them) sounds like more to manage, but the verse’s whole claim is that at this stage it stops being management at all.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- यदि किसी आदत या लालसा को काबू में रखने के लिए अब भी लगातार प्रयास करना पड़ता है, तो आप अभी उससे मुक्त नहीं हुए हैं — आप अभी उसे केवल सँभाल रहे हैं। प्रगति का असली चिह्न तब है जब उसकी पकड़ अपने आप ढीली पड़ जाए, न कि तब जब आपका नियंत्रण और कड़ा हो जाए।
व्यावसायिक
- यदि दफ़्तर की राजनीति या आत्म-प्रचार से बचना अब भी साफ़ दिखने वाला प्रयास और लगातार सतर्कता माँगता है, तो आप उस आवेग को सँभाल रहे हैं, उससे मुक्त नहीं हैं — एक चरण के रूप में यह ठीक है, पर मुट्ठियाँ भींचकर किए गए संयम को उस शांत उदासीनता के बराबर न समझ बैठें जिसकी ओर आप बढ़ रहे हैं।
परिवार और समाज
- यदि परिवार के किसी सदस्य के साथ होने वाली जानी-पहचानी बहस से बचने के लिए आपको अब भी सोच-समझकर अपनी ज़ुबान रोकनी पड़ती है, तो आप प्रतिक्रिया को दबा रहे हैं, उससे आगे नहीं निकले हैं — इस अंतर पर ध्यान दें, और उनके साथ जितनी शांति आपने वास्तव में अब तक अर्जित की है, उससे अधिक का दावा न करें।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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