संस्कृत
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥
asaṃyatātmanā yogo duṣprāpa iti me matiḥ vaśyātmanā tu yatatā śakyo'vāptum upāyataḥ
अनुवाद
मेरा मत है कि जिसका मन वश में नहीं है, उसके लिए योग पाना कठिन है; परन्तु जिसने अपने मन को वश में कर लिया है और जो प्रयत्न करता है, वह उचित उपाय से इसे प्राप्त कर सकता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
कृष्ण श्लोक 5–7 की आत्म/आत्मा वाली शब्दावली का प्रयोग करते हुए श्लोक 35 के ‘पहले स्वीकार, फिर उत्तर’ वाले क्रम को दोहराते हैं: जिसने अपने मन पर अधिकार नहीं पाया, उसके लिए योग सचमुच कठिन है, असंभव तक, पर जो उचित विधि से आत्म-संयम का प्रयास करता है, उसके लिए यह प्राप्त किया जा सकता है। यहाँ ज़ोर केवल प्रयास पर नहीं, विधि पर है, और यही अगले खंड की भूमिका बनाता है, जहाँ बात अर्जुन की गहरी चिंता की ओर मुड़ती है। उपायतः — “[उचित] उपाय से” — इस श्लोक का मुख्य शब्द है: दुष्प्राप और शक्य के बीच का अंतर अधिक इच्छाशक्ति का नहीं, बल्कि एक कारगर विधि का है, और यही विधि श्लोक 10–26 में बताई गई थी।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- asaṃyatātmanā yogoअसंयतात्मना योगो
- जिसका मन वश में नहीं, उसके लिए योग (asaṃyata-ātmanā + yogaḥ)
- duṣprāpa iti me matiḥदुष्प्राप इति मे मतिः
- कठिनाई से प्राप्त होता है — ऐसा मेरा मत है (duṣprāpaḥ + iti + me + matiḥ)
- vaśyātmanā tu yatatāवश्यात्मना तु यतता
- परन्तु जिसका मन वश में है, ऐसे प्रयत्नशील के लिए (vaśya-ātmanā + tu + yatatā)
- śakyo'vāptum upāyataḥशक्योऽवाप्तुं उपायतः
- उचित उपाय से प्राप्त किया जा सकता है (śakyaḥ + avāptum + upāyataḥ)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Verse 35 named the tools (practice, dispassion); this verse adds something neither tool guarantees on its own — proper method (upāyataḥ). Effort without method and dispassion without direction can both be sincere and still fail; the verse is careful to credit not raw striving but properly directed striving, a distinction that matters as much in practice as in theory.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- जिस आदत को बनाने में आपको कठिनाई हो रही है, उसके लिए केवल और ज़्यादा ज़ोर न लगाएँ — यह जाँचें कि क्या आपका तरीका सचमुच उस बाधा के लिए सही है, क्योंकि गलत तकनीक पर लगाया गया सच्चा प्रयास भी ठीक उतनी ही बार विफल हो सकता है जितना बिल्कुल प्रयास न करना।
व्यावसायिक
- जब कोई टीम कड़ी मेहनत कर रही हो पर आगे न बढ़ पा रही हो, तो उपाय आमतौर पर 'और ज़ोर लगाओ' नहीं होता — उपाय यह जाँचना है कि क्या तरीका स्वयं सही है। सही दिशा में लगाया गया प्रयास हर बार केवल कच्चे प्रयास से बेहतर होता है, और यह श्लोक इस अंतर को स्पष्ट रूप से बताने पर ज़ोर देता है।
परिवार और समाज
- यदि आप किसी रिश्ते में सच्चा प्रयास कर रहे हैं पर वह सुधर नहीं रहा, तो सोचिए कि शायद उस प्रयास को और अधिक तीव्रता की नहीं, बल्कि किसी दूसरे तरीके की ज़रूरत है — गलत दिशा में किया गया सच्चा प्रयास भी उतना ही अटक सकता है जितना प्रयास न करना।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
स्वयं से पूछें
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