6.35

संस्कृत

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥

asaṃśayaṃ mahābāho mano durnigrahaṃ calam abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate

अनुवाद

हे महाबाहो, निःसंदेह मन चंचल है और इसे वश में करना कठिन है; किंतु हे कौन्तेय, अभ्यास और वैराग्य से यह वश में किया जाता है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

कृष्ण उत्तर देने से पहले अर्जुन की बात को पूरी तरह स्वीकार करते हैं — “निःसंदेह”। यहाँ बताए गए दो साधन, अभ्यास (बार-बार का प्रयास) और वैराग्य (अनासक्ति), वही जोड़ी हैं जो आगे चलकर शास्त्रीय योग की औपचारिक पद्धति बनती है; कृष्ण यहाँ कोई नई चीज़ गढ़ने से ज़्यादा उसी मानक उत्तर को नाम दे रहे हैं। अभ्यास और वैराग्य — निरंतर दोहराव, और चाह का ठंडा पड़ना — वह दोनों हाथों वाली पकड़ हैं जिसे बाद में योगसूत्र ने अपना बना लिया (योगसूत्र 1.12)। एक मन को स्थिर करता है, दूसरा उस बेचैनी को पोषण देना बंद कर देता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

asaṃśayaṃ mahābāhoअसंशयं महाबाहो
निःसंदेह, हे महाबाहो (asaṃśayam + mahā-bāho)
mano durnigrahaṃ calamमनो दुर्निग्रहं चलं
मन कठिनता से वश में होने वाला और चंचल है (manaḥ + durnigraham + calam)
abhyāsena tu kaunteyaअभ्यासेन तु कौन्तेय
परंतु अभ्यास से, हे कौन्तेय (abhyāsena + tu + kaunteya)
vairāgyeṇa ca gṛhyateवैराग्येण च गृह्यते
और वैराग्य से वश में किया जाता है (vairāgyeṇa + ca + gṛhyate)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The two tools Krishna names aren’t redundant restatements of each other — abhyāsa builds something through repetition, vairāgya releases something through loosened attachment. One works by addition, the other by subtraction, and the verse implies both directions of effort are required together; practice alone without release, or release alone without practice, is only half the remedy.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

Site Commentary — Second Reading

Krishna’s first word is asaṃśayam — “without doubt” — a full concession of Arjuna’s objection before any remedy is offered; the mind’s restlessness isn’t minimized or argued away. That order matters: conceding the difficulty fully, then naming the method, carries more weight than a method offered alongside denial that the problem is real. It’s a pattern worth noticing in any teaching or coaching moment — credibility for the fix is often earned by how honestly the difficulty was acknowledged first.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • शुरुआत में मन स्थिरता का विरोध करेगा, यह मानकर चलें — श्लोक स्वयं स्वीकार करता है कि यह एक महाबाहु योद्धा के लिए भी कठिन है। किसी एक बैठक के अच्छा जाने से कहीं अधिक महत्त्व इस बात का है कि आप हर बैठक में निरंतरता बनाए रखें।

व्यावसायिक

  • काम से जुड़ी जो भी नई आदत आप बना रहे हैं, उसके साथ यह भी करें कि उसके तुरंत पूरी तरह सही बैठ जाने के प्रति अपनी आसक्ति को सचमुच ढीला करें — 'सब या कुछ नहीं' के दबाव पर बनी आदतें अक्सर पहला दिन छूटते ही बिखर जाती हैं।

परिवार और समाज

  • 'अभ्यास और वैराग्य' का यही सूत्र परिवार के साथ धैर्य रखने पर भी लागू होता है — स्थिर, बार-बार किया गया प्रयास, बिना यह माँग किए कि रिश्ता एक ही बातचीत में ठीक हो जाए।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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