संस्कृत
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवाऽयं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥
sukham ātyantikaṃ yat tad buddhigrāhyam atīndriyam vetti yatra na caivāyaṃ sthitaś calati tattvataḥ
अनुवाद
जिस अवस्था में वह उस परम सुख का अनुभव करता है जो इन्द्रियों से परे है और केवल बुद्धि से ग्रहण किया जा सकता है, और जिसमें स्थित होकर वह तत्त्व से कभी विचलित नहीं होता।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
श्लोक 20 से चली आ रही कड़ी को आगे बढ़ाते हुए, यह श्लोक उस आनंद को आत्यन्तिक कहता है — परम, हर सीमा से परे — और विशेष रूप से ऐसी वस्तु बताता है जिसे बुद्धि (उच्चतर विवेक) इन्द्रिय-बोध को पूरी तरह लाँघकर सीधे ग्रहण करती है। पाठ कहता है कि वहाँ एक बार स्थित हो जाने पर व्यक्ति जो वास्तविक है (तत्त्वतः), उससे बस विचलित नहीं होता — इसकी पहचान स्थिरता है, तीव्रता नहीं। बुद्धिग्राह्य, अतीन्द्रिय — बुद्धि से प्राप्त, इन्द्रियों से परे — ये शब्द इस सुख को गीता 5.22 के हर स्पर्शजन्य सुख से अलग करते हैं: इसका कोई इन्द्रिय-विषय नहीं है, इसलिए इसमें क्षीण होने वाला कुछ भी नहीं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- sukham ātyantikaṃ yat tadसुखं आत्यन्तिकं यत् तद्
- जो वह असीम सुख है (sukham + ātyantikam + yat + tat)
- buddhigrāhyam atīndriyamबुद्धिग्राह्यं अतीन्द्रियं
- बुद्धि से ग्रहण होने वाला, इन्द्रियों से परे (buddhi-grāhyam + atīndriyam)
- vetti yatra na caivāyaṃवेत्ति यत्र न चैवायं
- जानता है — जिसमें यह (योगी) (vetti + yatra + na + ca + eva + ayam)
- sthitaś calati tattvataḥस्थितश् चलति तत्त्वतः
- स्थित होकर तत्त्व से विचलित नहीं होता (sthitaḥ + calati + tattvataḥ)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
This verse makes a claim worth pausing on: the delight described here is grasped by buddhi — reasoned discernment — not by the senses at all, and its mark isn’t intensity but the fact that once established there, one simply doesn’t move. That’s a specific and testable definition, and it rules out mistaking a peak experience for the real thing.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- अगर आप सुख की जिस अवस्था के पीछे भाग रहे हैं, उसे सच्चा मानने के लिए उसका बेहद नाटकीय महसूस होना ज़रूरी है, तो शायद आप गलत चीज़ खोज रहे हैं — इस श्लोक की कसौटी स्थिरता है, तीव्रता नहीं। ऐसी शांत अवस्था, जिससे आप डिगते नहीं, उस एक चरम आनंद से कहीं अधिक मूल्यवान है जिसे आप टिकाए नहीं रख सकते।
व्यावसायिक
- किसी प्रक्रिया में किया गया सुधार सचमुच कारगर रहा या नहीं, इसका निर्णय इस बात से न करें कि शुरुआती नतीजे कितने रोमांचक लगे — इसका निर्णय इस बात से करें कि हफ़्तों बाद दबाव में भी टीम नए स्तर पर टिकी रहती है या नहीं। असली कसौटी तनाव में स्थिरता है, शुरुआती उत्साह नहीं।
परिवार और समाज
- किसी रिश्ते की सेहत को उसके सबसे तीव्र, भावुक क्षणों से न मापें — उसे इस बात से मापें कि जब कुछ भी नाटकीय नहीं हो रहा होता, तब वह कितना स्थिर रहता है। भरोसे लायक असली संकेत स्थिरता है, तीव्रता नहीं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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