संस्कृत
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥
pārtha naiveha nāmutra vināśas tasya vidyate na hi kalyāṇakṛt kaścid durgatiṃ tāta gacchati
अनुवाद
हे पार्थ, उसका न तो इस लोक में विनाश होता है और न ही परलोक में; क्योंकि हे तात, कल्याणकारी कर्म करने वाला कोई भी व्यक्ति कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
श्लोक 37–39 पर कृष्ण का उत्तर तुरंत और बिना किसी शर्त के है: जिसने सच्चे मन से शुभ के लिए प्रयत्न किया है, उसका न इस लोक में विनाश होता है, न परलोक में। यही वह आश्वासन है जिसकी ओर पूरा संवाद बढ़ता आ रहा था — श्लोक 38 में अर्जुन की सबसे बुरी आशंका, “छिन्न-भिन्न बादल” वाली स्थिति, को स्पष्ट शब्दों में नकारा गया है, किसी किन्तु-परन्तु के साथ नहीं। तात — “मेरे बच्चे”, स्नेह का वह संबोधन जिसका प्रयोग गुरु अपने शिष्य के लिए करता है — गीता में यही एकमात्र स्थान है जहाँ कृष्ण अर्जुन को इस तरह संबोधित करते हैं। यह सांत्वना आत्मीयता से दी गई है, सिद्धांत के रूप में नहीं: न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं गच्छति।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- pārtha naiveha nāmutraपार्थ नैवेह नामुत्र
- हे पार्थ, न तो इस लोक में और न ही परलोक में (pārtha + na + eva + iha + na + amutra)
- vināśas tasya vidyateविनाशस् तस्य विद्यते
- उसका विनाश नहीं होता (vināśaḥ + tasya + vidyate)
- na hi kalyāṇakṛt kaścidन हि कल्याणकृत् कश्चिद्
- क्योंकि कल्याणकारी कर्म करने वाला कोई भी (na + hi + kalyāṇa-kṛt + kaścit)
- durgatiṃ tāta gacchatiदुर्गतिं तात गच्छति
- हे तात, दुर्गति को प्राप्त नहीं होता (durgatim + tāta + gacchati)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The language stacks two things that don’t usually travel together: maximal certainty (neither here nor hereafter, never any) and maximal warmth (the address “tāta,” beloved, more intimate than the formal “Pārtha” the verse opens with). Krishna doesn’t soften the guarantee to make it gentle, and he doesn’t state it coldly to make it firm — he does both in the same breath, as if real reassurance requires exactly this combination.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आपको किसी सच्चे डर के बारे में खुद को आश्वस्त करना हो, तो अपने साथ दृढ़ रहने और अपने साथ कोमल रहने में से किसी एक को न चुनें — सबसे मज़बूत आश्वासन दोनों को एक साथ थामे रहता है, ठीक वैसे ही जैसे यह श्लोक एक पूर्ण आश्वासन को अपने सबसे आत्मीय संबोधन के साथ जोड़ता है।
व्यावसायिक
- जब आप किसी संघर्ष कर रहे सहकर्मी को आश्वस्त कर रहे हों, तो सीधे-सपाट भरोसे ('आप ठीक हैं, यह सुलझ गया है') और आत्मीयता में से किसी एक को न चुनें — दोनों को एक साथ दें। आत्मीयता के बिना निश्चितता उपेक्षा जैसी लगती है; निश्चितता के बिना आत्मीयता वास्तव में आश्वस्त नहीं करती।
परिवार और समाज
- जब आपके किसी करीबी को किसी विफलता के बाद आश्वासन की ज़रूरत हो, तो उन्हें सीधा, बिना किसी किंतु-परंतु वाला आश्वासन भी दें और अपना सबसे आत्मीय स्वर भी — कोमल दिखने के लिए निश्चितता को नरम कर देना, या दृढ़ दिखने के लिए उसे रूखेपन से कहना, दोनों ही उस चीज़ को कम आँकते हैं जिसकी सच्चे आश्वासन को ज़रूरत होती है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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