संस्कृत
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणाऽपि विचाल्यते ॥
yaṃ labdhvā cāparaṃ lābhaṃ manyate nādhikaṃ tataḥ yasmin sthito na duḥkhena guruṇāpi vicālyate
अनुवाद
जिसे पाकर वह उससे बढ़कर किसी दूसरे लाभ को नहीं मानता, और जिसमें स्थित होकर वह भारी दुःख से भी विचलित नहीं होता।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
शृंखला आगे बढ़ती है: यह लाभ अपने आप में पूर्ण है — इसके आगे कुछ भी अधिक वांछनीय नहीं लगता — और इसे इसके विपरीत, यानी भारी दुःख, की कसौटी पर परखा जाता है, जो वहाँ स्थित व्यक्ति को डिगा नहीं पाता। यह विपत्ति में स्थिरता की वही परीक्षा है जो श्लोक 7 की द्वन्द्व-सूची में थी, पर अब इसे बाहरी परिस्थिति पर नहीं, बल्कि स्वयं ध्यान की अवस्था पर लागू किया गया है। न दुःखेन गुरुणा अपि विचाल्यते — “भारी दुःख से भी विचलित नहीं होता” — यही दबाव की परीक्षा है: इस अवस्था की पुष्टि उससे होती है जो इसे हिला नहीं सकता, और यही कसौटी गीता 2.56 के स्थितप्रज्ञ की भी है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- yaṃ labdhvā cāparaṃ lābhaṃयं लब्ध्वा चापरं लाभं
- जिसे पाकर कोई दूसरा लाभ (yam + labdhvā + ca + aparam + lābham)
- manyate nādhikaṃ tataḥमन्यते नाधिकं ततः
- उससे बढ़कर नहीं मानता (manyate + na + adhikam + tataḥ)
- yasmin sthito na duḥkhenaयस्मिन् स्थितो न दुःखेन
- जिसमें स्थित होकर दुःख से (yasmin + sthitaḥ + na + duḥkhena)
- guruṇāpi vicālyateगुरुणापि विचाल्यते
- भारी (दुःख) से भी विचलित नहीं होता (guruṇā + api + vicālyate)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The test in this verse is unusually strict: not merely that the gain feels good, but that nothing beyond it registers as more desirable, and that heavy sorrow specifically fails to dislodge it. Verse 7 ran this same test — stability under adversity — against external circumstance; here it’s run against the meditative attainment itself, which is a much higher bar than simply enjoying the state while things are going well.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- संतोष की ऐसी भावना पर भरोसा न करें जो केवल तभी टिकी रहती है जब जीवन अच्छा चल रहा हो — उसे किसी वास्तविक झटके पर परखें। अगर कोई एक कठिन समाचार आपको उस शांति से पूरी तरह डिगा सकता है जिसे आप समझते थे कि आपने पा लिया है, तो आपने उसे अभी पाया नहीं था; आपने बस एक मनोदशा पाई थी।
व्यावसायिक
- किसी रणनीति में अपने आत्मविश्वास पर केवल इसलिए भरोसा न करें कि वह शांत तिमाहियों में काम कर रही है — असली परीक्षा यह है कि उस पर आपका दृढ़ विश्वास किसी खराब तिमाही या सार्वजनिक विफलता के बाद भी बना रहता है या नहीं। अगर नहीं बना रहता, तो वह दृढ़ विश्वास नहीं था, वह केवल गति थी।
परिवार और समाज
- किसी रिश्ते में अपनी सुरक्षा की भावना को केवल उसके आसान दौर में न आँकें — उसे इस पर परखें कि वह किसी वास्तविक मतभेद या कठिनाई में कैसे टिकी रहती है। जो सुरक्षा केवल अच्छे समय में ही बची रहती है, वह अभी सुरक्षा नहीं है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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