संस्कृत
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् । उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥
praśāntamanasaṃ hy enaṃ yoginaṃ sukham uttamam upaiti śāntarajasaṃ brahmabhūtam akalmaṣam
अनुवाद
जिसका मन पूरी तरह शान्त है, जिसका रजोगुण शान्त हो गया है, जो निष्पाप है और ब्रह्मरूप हो गया है, ऐसे इस योगी को निश्चय ही उत्तम सुख प्राप्त होता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
श्लोक 26 का अभ्यास कर चुके योगी के लिए तीन विशेषण एक साथ आते हैं: शांत मन, शांत हुआ रजस् (आवेग और सक्रियता का गुण, जिसका औपचारिक परिचय आगे चलकर अध्याय 14 में ही होता है, पर जो यहाँ पहले से ही काम कर रहा है), और निष्पापता। जो फल बताया गया है — ब्रह्म हो जाना — वह अस्तित्व के स्तर का एक प्रबल दावा है, जिसे यह अध्याय लगभग चलते-चलते कह देता है। शान्तरजस् — रजस् का धागा शांत हो जाना — इसी कारण मन विश्राम कर पाता है; ब्रह्मभूत, “ब्रह्म हो गया”, गीता 5.24 का एकरूपता का दावा है, जिसे यहाँ ध्यान करने वाले के परिणाम के रूप में फिर से कहा गया है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- praśāntamanasaṃ hy enaṃप्रशान्तमनसं ह्य् एनं
- निश्चय ही इस प्रशान्त मन वाले (praśānta-manasam + hi + enam)
- yoginaṃ sukham uttamamयोगिनं सुखं उत्तमं
- योगी को उत्तम सुख (yoginam + sukham + uttamam)
- upaitiउपैति
- प्राप्त होता है (upaiti)
- śāntarajasaṃशान्तरजसं
- जिसका रजोगुण शान्त हो गया है (śānta-rajasam)
- brahmabhūtam akalmaṣamब्रह्मभूतं अकल्मषं
- ब्रह्मरूप हुए, निष्पाप (brahma-bhūtam + akalmaṣam)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Notice what this verse makes the object of pursuit and what it makes the consequence: nowhere does the practice aim at joy directly — joy is named only as what comes to the yogi who has already calmed the mind and stilled rajas. The verse quietly refuses the idea that happiness can be chased head-on; it only arrives as a byproduct of getting something else right first.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- सुख को ऐसा लक्ष्य मानना छोड़ दीजिए जिसे आप सीधे पा सकें — यह श्लोक उसे केवल उस चीज़ के रूप में बताता है जो असली काम (मन को शांत करना, अभ्यास को बनाए रखना) पूरा होने के बाद अपने आप आती है। अभ्यास पर ध्यान दें, भावना पर नहीं, और भावना को उसके पीछे-पीछे आने दें।
व्यावसायिक
- टीम के मनोबल या काम से संतोष के पीछे सुविधाओं और नारों के सहारे सीधे न भागें — उसे सही बुनियादी स्थितियाँ बनाने का स्वाभाविक परिणाम मानें: स्पष्ट प्राथमिकताएँ, शांत कार्यप्रणाली, कम अव्यवस्था। अच्छी भावना सुधार के बाद आती है, उसकी जगह नहीं ले सकती।
परिवार और समाज
- अगर आप चाहते हैं कि कोई रिश्ता अधिक आत्मीय या आनंदमय लगे, तो उस भावना के पीछे सीधे न भागें — वह प्रायः पहले कठिन, शांत काम करने के परिणामस्वरूप आती है: निरंतरता, धैर्य, साथ निभाना। काम के पीछे चलें, भावना के पीछे नहीं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
स्वयं से पूछें
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