6.25

संस्कृत

शनैःशनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥

śanaiḥ śanair uparamed buddhyā dhṛtigṛhītayā ātmasaṃsthaṃ manaḥ kṛtvā na kiñcid api cintayet

अनुवाद

धृति से दृढ़ की हुई बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे शान्त होता जाए; मन को आत्मा में स्थित करके कुछ भी चिन्तन न करे।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

इस अध्याय में विधि का सबसे स्पष्ट कथन यही है, जो उसे क्रमिकता के रूप में रखता है — “धीरे-धीरे” — और किसी भी अचानक मिलने वाली सफलता की अपेक्षा के विरुद्ध खड़ा है। स्वयं बुद्धि को भी यह काम कर पाने से पहले धृति (दृढ़ता) द्वारा स्थिर किए जाने की आवश्यकता है, और यहाँ बताया गया अंतिम लक्ष्य असामान्य रूप से कठोर है: जब मन आत्मा में टिक जाए, तब कुछ भी न सोचें। शनैः शनैः — “क्रमशः, धीरे-धीरे” — गीता के ध्यान को तात्कालिक अवस्थाओं के किसी भी वादे के विरुद्ध खड़ा करता है; धृति (स्थिर संकल्प) वह पूर्व-शर्त है जिसे गीता 6.35 अभ्यास नाम देगा।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

śanaiḥ śanair uparamedशनैः शनैः उपरमेद्
धीरे-धीरे शांत हो जाए (śanaiḥ + śanaiḥ + uparamet)
buddhyā dhṛtigṛhītayāबुद्ध्या धृतिगृहीतया
धैर्य से स्थिर की हुई बुद्धि द्वारा (buddhyā + dhṛti-gṛhītayā)
ātmasaṃsthaṃ manaḥ kṛtvāआत्मसंस्थं मनः कृत्वा
मन को आत्मा में स्थित करके (ātma-saṃstham + manaḥ + kṛtvā)
na kiñcid api cintayetन किञ्चिद् अपि चिन्तयेत्
कुछ भी चिंतन न करे (na + kiñcit + api + cintayet)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Notice the mismatch this verse holds without resolving it: the method it prescribes is the gentlest possible (“slowly, slowly”), yet the destination it names is the most absolute possible — a mind that thinks of nothing at all. The verse doesn’t ask for a leap proportional to the goal; it trusts that patient, repeated small steps eventually arrive somewhere far larger than any single step could reach.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब कोई लक्ष्य इतना बड़ा लगे कि उस तक सीधे पहुँचना कठिन हो — जैसे मन की पूर्ण स्थिरता या जीवन में कोई बड़ा बदलाव — तो मंज़िल जितनी बड़ी छलाँग ज़बरदस्ती लगाने के बजाय अभ्यास के सबसे सौम्य, धीरे-धीरे बढ़ने वाले रूप पर भरोसा करें। छोटे, स्थिर कदम जुड़ते-जुड़ते उन लक्ष्यों तक ले जाते हैं जहाँ कोई एक कदम कभी नहीं पहुँच सकता।

व्यावसायिक

  • जब आपकी टीम के सामने कोई महत्वाकांक्षी लक्ष्य हो (पूरे प्लेटफ़ॉर्म का स्थानांतरण, बिना किसी घटना वाली एक तिमाही), तो लक्ष्य जितनी ही नाटकीय योजना बनाने के लोभ से बचें — उसे सबसे छोटे, भरोसेमंद चरणों में क्रम से बाँटें और स्थिर क्रियान्वयन को दूरी पाटने दें।

परिवार और समाज

  • यदि आप किसी ऐसे रिश्ते को सुधारना या गहरा करना चाहते हैं जो दूर-सा लगता है, तो किसी एक बड़े कदम या बातचीत की प्रतीक्षा न करें कि वही सब ठीक कर देगी — ध्यान देने के सबसे छोटे, बार-बार किए गए कार्य, धीरे-धीरे निभाए जाने पर, वे दूरियाँ मिटा देते हैं जिन्हें कोई एक नाटकीय प्रयास नहीं मिटा सकता।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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