संस्कृत
सङ्कल्पप्रभावान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥
saṅkalpaprabhavān kāmāṃs tyaktvā sarvān aśeṣataḥ manasaivendriyagrāmaṃ viniyamya samantataḥ
अनुवाद
संकल्प से उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं को पूरी तरह त्यागकर और मन से ही इन्द्रियों के समूह को हर ओर से वश में करके,
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
उपदेश फिर से अपने व्यावहारिक स्वर में लौटता है और संकल्प पर वापस आता है, जिसकी चर्चा पिछली बार श्लोक 2 और 4 में हुई थी। यहाँ संकल्प को इच्छा का उद्गम-बिंदु माना गया है: कहा गया है कि इच्छाएँ उसी आगे की योजना गढ़ने वाले संकल्प से जन्म लेती हैं। बताई गई विधि है मन द्वारा इन्द्रियों को “सब ओर से” रोकना। यह चुनिंदा नहीं, बल्कि सम्पूर्ण रूप से इन्द्रियों को भीतर समेटना है। संकल्पप्रभव (“योजना बनाने वाले संकल्प से उत्पन्न”) शब्द जड़ को नाम देता है: काम को संकल्प पर ही काट दें, तो इन्द्रियों के पास पीछा करने को कुछ नहीं बचता। इसीलिए यह संयम समन्ततः है, यानी एक साथ सभी ओर से।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- saṅkalpaprabhavān kāmāṃsसङ्कल्पप्रभवान् कामांस्
- संकल्प से उत्पन्न कामनाओं को (saṅkalpa-prabhavān + kāmān)
- tyaktvā sarvān aśeṣataḥत्यक्त्वा सर्वान् अशेषतः
- सबको पूरी तरह, बिना कुछ शेष छोड़े त्यागकर (tyaktvā + sarvān + aśeṣataḥ)
- manasaivendriyagrāmaṃमनसैवेन्द्रियग्रामं
- मन से ही इन्द्रियों के समूह को (manasā + eva + indriya-grāmam)
- viniyamya samantataḥविनियंय समन्ततः
- सब ओर से वश में करके (viniyamya + samantataḥ)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Sankalpa returns for a third time — verse 2 named it as what must be renounced, verse 4 listed it among what’s released, and now this verse identifies it as the actual point of origin: desires are born from that projecting will, not the other way around. The method specified is total, “from every side,” which rules out the easier strategy of restraining the senses selectively while leaving the will that generates the craving untouched.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- यदि आप किसी आदत को रोकने के लिए उससे जुड़े खास व्यवहारों पर तो लगाम लगा रहे हैं, पर भीतर के उस ढर्रे को नहीं छू रहे जो लालसा पैदा करता है, तो आप केवल लक्षण का इलाज कर रहे हैं। श्लोक जड़ की ओर संकेत करता है, उस संकल्प की ओर जो चाह को जन्म देता ही रहता है।
व्यावसायिक
- यदि आप काम के दायरे के लगातार बढ़ते जाने को एक-एक माँग पर रोक लगाकर सुधारने की कोशिश कर रहे हैं, तो आप केवल लक्षण सँभाल रहे हैं। असली सुधार जड़ में है: वह योजना-प्रक्रिया जो नई माँगें पैदा करती ही रहती है। हर एक मामले को नहीं, स्रोत को सुधारें।
परिवार और समाज
- यदि आप किसी व्यक्ति के साथ बार-बार उठने वाले तनाव को हर घटना के सामने आने पर उसे सँभालकर कम करने की कोशिश कर रहे हैं, तो आप अब भी जड़ से दूर हैं। इसके बजाय उस भीतरी अपेक्षा या ज़रूरत को खोजें जो बार-बार वही टकराव पैदा करती है, और सीधे उसी को सुलझाएँ।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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