संस्कृत
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥
ātmaupamyena sarvatra samaṃ paśyati yo'rjuna sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ sa yogī paramo mataḥ
अनुवाद
हे अर्जुन, जो आत्मा की समानता के द्वारा सर्वत्र समता देखता है, चाहे सुख हो या दुःख, वह परम योगी माना जाता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह अध्याय में “सर्वोच्च” योगी की सारांश-परिभाषा है, जो उस क्रम को पूरा करती है जो श्लोक 9 में सभी लोगों के प्रति निष्पक्षता से आरम्भ हुआ था — अब यह स्पष्ट रूप से दूसरों को स्वयं के सादृश्य से देखने पर आधारित है; यही वह कदम है जिसे बाद के नैतिक ग्रन्थ करुणा के “स्वर्णिम नियम” वाले आधार के रूप में औपचारिक रूप देते हैं। ठीक अगले श्लोक में अर्जुन की आपत्ति सीधे इसी आदर्श पर लक्षित है। आत्मौपम्य — “स्वयं को मापदण्ड मानना” — समदृष्टि को दूसरों के सुख और दुःख पर लागू की गई कल्पना का कार्य बना देता है: स्वर्णिम नियम कहने के जितने निकट गीता आती है, उतना यहीं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- ātmaupamyena sarvatra samaṃआत्मौपंयेन सर्वत्र समं
- अपने समान मानकर सब जगह एक समान (ātma-aupamyena + sarvatra + samam)
- paśyati yo'rjunaपश्यति योऽर्जुन
- जो देखता है, हे अर्जुन (paśyati + yaḥ + arjuna)
- sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃसुखं वा यदि वा दुःखं
- चाहे सुख हो या दुःख (sukham + vā + yadi + vā + duḥkham)
- sa yogī paramo mataḥस योगी परमो मतः
- वह योगी सर्वश्रेष्ठ माना गया है (saḥ + yogī + paramaḥ + mataḥ)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The standard named here isn’t an external rule to be memorized and applied — it’s your own felt experience of pleasure and pain, used as the measuring instrument for everyone else’s. Instead of asking Arjuna to consult a moral code, the verse asks him to consult something he already has unmediated access to: what pain and pleasure feel like from the inside, then extend that same weight to others.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- किसी के साथ कैसा व्यवहार करें, यह तय करते समय किसी अमूर्त नियम का सहारा लेने के बजाय दुख और सुख के अपने स्वयं के अनुभव को ही असली मापदंड बनाइए — आप पहले से ठीक-ठीक जानते हैं कि ऐसी कोई बात कितना दुख देती है या कितनी मदद करती है, क्योंकि आपने इसे स्वयं महसूस किया है।
व्यावसायिक
- किसी सहकर्मी को प्रभावित करने वाली कोई नीति बनाने या कोई निर्णय लेने से पहले, उसे काम पर मिले सुखद और अप्रिय व्यवहार के अपने अनुभव की कसौटी पर परखिए — निष्पक्षता का कोई अमूर्त सिद्धांत इस जाँच से कम भरोसेमंद है कि 'अगर यह मेरे साथ किया जाता, तो क्या मैं इसे स्वीकार करता?'
परिवार और समाज
- जब आप निश्चित न हों कि किसी और की पीड़ा या ज़रूरत को कितना महत्व दें, तो उसी भावना के अपने याद किए हुए अनुभव को पैमाना बनाइए — यह जानने के लिए कि ऐसी कोई बात किसी व्यक्ति पर वास्तव में कितनी भारी पड़ती है, आपको किसी बाहरी नियम की ज़रूरत नहीं है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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