संस्कृत
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥
yo'yaṃ yogas tvayā proktaḥ sāmyena madhusūdana etasyāhaṃ na paśyāmi cañcalatvāt sthitiṃ sthirām
अनुवाद
हे मधुसूदन, आपने समता के रूप में जो यह योग बताया है, चंचलता के कारण मैं इसकी स्थिर स्थिति नहीं देख पाता।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
अध्याय 2 के बाद पहली बार अर्जुन उपदेश को बीच में रोकते हैं, और वक्ता का यह बदलाव मायने रखता है: अभी-अभी दिए गए ध्यान के निर्देशों (श्लोक 10–32) का उत्तर सहमति से नहीं, बल्कि एक सीधी व्यावहारिक आपत्ति से मिलता है। कृष्ण जिस अवस्था का वर्णन करते हैं, उसके मूल्य पर वे विवाद नहीं करते — वे उसकी प्राप्ति पर प्रश्न उठाते हैं, क्योंकि वे अपने मन के बारे में पहले से जानते हैं। यह आपत्ति प्रतिरोध नहीं, बल्कि इंजीनियर जैसी ईमानदार परख है: अर्जुन लक्ष्य को स्वीकार करते हैं और उसकी व्यवहार्यता को चुनौती देते हैं। चञ्चलत्व — “मन की छटपटाहट” — ही वह विशिष्ट बाधा है जिसका वे नाम लेते हैं, और गीता 6.35 सीधे उसी का उत्तर देता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- yo'yaṃ yogas tvayā proktaḥयोऽयं योगस् त्वया प्रोक्तः
- यह जो योग आपने बताया है (yaḥ + ayam + yogaḥ + tvayā + proktaḥ)
- sāmyena madhusūdanaसांयेन मधुसूदन
- समभाव के रूप में, हे मधुसूदन (sāmyena + madhusūdana)
- etasyāhaṃ na paśyāmiएतस्याहं न पश्यामि
- मैं इसकी नहीं देख पाता (etasya + aham + na + paśyāmi)
- cañcalatvāt sthitiṃ sthirāmचञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिरां
- चंचलता के कारण स्थिर स्थिति (cañcalatvāt + sthitim + sthirām)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Arjuna’s objection is precise in a way that’s easy to miss: he never disputes that equanimity is the right goal — he grants Krishna’s whole account of it — and objects only on the narrower ground of his own self-knowledge about the mind’s restlessness. It’s the difference between rejecting an ideal and doubting your capacity to reach it, and the text treats that second kind of doubt as worth a real answer, not a rebuke.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आपको अपने किसी लक्ष्य पर संदेह हो, तो जाँचें कि क्या आप सचमुच उस लक्ष्य से असहमत हैं, या आपको बस इस पर संदेह है कि अभी आप उस तक पहुँचने में सक्षम हैं या नहीं — इन दोनों को एक मान लेने से आप अच्छे लक्ष्यों को ऐसी क्षमता की कमी के कारण छोड़ देते हैं जिसे वास्तव में दूर किया जा सकता है।
व्यावसायिक
- जब कोई सहकर्मी किसी लक्ष्य पर आपत्ति करे, तो ध्यान से सुनें कि वह स्वयं लक्ष्य पर सवाल उठा रहा है या उस तक पहुँचने में क्षमता की किसी वास्तविक कमी की ओर संकेत कर रहा है — दूसरी तरह की आपत्ति तरीके के बारे में ठोस उत्तर की हक़दार है, न कि इस बचाव की कि लक्ष्य सही क्यों है।
परिवार और समाज
- यदि आपका कोई निकट व्यक्ति किसी साझा योजना पर संदेह व्यक्त करे, तो यह न मान लें कि उसने योजना को ठुकरा दिया है — हो सकता है वह ईमानदारी से बता रहा हो कि उसे निभाने की उसकी अपनी क्षमता में कमी है, और इसके लिए 'कैसे' में सहायता चाहिए, न कि 'क्यों' पर बहस।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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