18.47

संस्कृत

श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ ४७ ॥

śreyān sva-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣṭhitāt svabhāva-niyataṃ karma kurvan nāpnoti kilbiṣam

अनुवाद

अपना धर्म गुणरहित होने पर भी, भली-भाँति आचरण किए गए पराए धर्म से श्रेष्ठ है। अपने स्वभाव से नियत कर्म करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह पंक्ति 3.35 (“श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्”) की लगभग शब्दशः पुनरावृत्ति है। इसका अर्थ है कि दूसरे का कर्तव्य भली-भाँति निभाने से अपना कर्तव्य अपूर्ण रूप से करना बेहतर है। यह दोहराव जान-बूझकर किया गया है, लापरवाही से नहीं। अध्याय 3 ने इस बात को अर्जुन के संकट के लिए एक कामचलाऊ आधार-वाक्य के रूप में रखा था। अध्याय 18 इसी पर एक निश्चित निष्कर्ष के रूप में लौटता है। अब इसके पीछे पंद्रह और अध्यायों में कहा गया गुण-सिद्धांत, ध्यान और भक्ति है। यहाँ स्वधर्म का दावा यह नहीं है कि व्यक्ति को सौंपा गया कर्तव्य आसान या सुखद है। दावा केवल इतना है कि वह सच्चे अर्थों में उसका अपना है। किसी और के कर्तव्य के पीछे भागने को, भले ही वह बेहतर ढंग से निभाया गया हो, बड़ा जोखिम माना गया है। श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः — यह गीता 3.35 की लगभग शब्दशः वापसी है, जो अब काव्य के समापन पर आती है। गीता अर्जुन को दिया गया अपना पूरा उत्तर इन्हीं दो कथनों के बीच रखती है: दूसरे का कर्तव्य भली-भाँति निभाने से आपका अपना कर्तव्य बेहतर है, भले ही वह अपूर्ण रूप से किया जाए।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

śreyān sva-dharmo viguṇaḥश्रेयान् स्व-धर्मो विगुणः
अपना स्वधर्म, चाहे गुणरहित हो, श्रेष्ठ है (śreyān + sva-dharmaḥ + viguṇaḥ)
para-dharmāt sv-anuṣṭhitātपर-धर्मात् स्व्-अनुष्ठितात्
भली भाँति निभाए गए पराए धर्म से (para-dharmāt + su-anuṣṭhitāt)
svabhāva-niyataṃ karmaस्वभाव-नियतं कर्म
अपने स्वभाव से नियत कर्म (svabhāva-niyatam + karma)
kurvan nāpnoti kilbiṣamकुर्वन् नाप्नोति किल्बिषं
करते हुए मनुष्य पाप को नहीं पाता (kurvan + na + āpnoti + kilbiṣam)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

This verse doesn’t stand alone; verse 48 immediately follows it with the obvious objection, what if my own duty is done imperfectly, and answers it before Arjuna can even raise it. Read together, 47 and 48 form a single two-part argument: state the principle, then preempt its most natural counter, a construction the Gita uses more than once when it wants a claim to survive first contact with doubt rather than merely be repeated.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • अगर आप वर्षों से बार-बार अपने लिए एक ही सलाह पर लौटते रहते हैं, तो यह दोहराव अपने आप में कुछ बताता है — संभवतः यह किसी ऐसी चीज़ की ओर इशारा कर रहा है जिस पर बहुत कुछ टिका है, न कि किसी ऐसी चीज़ की ओर जिसे आप पहले ही पूरी तरह सीख चुके हैं।

व्यावसायिक

  • कोई सिद्धांत जिसे आपकी टीम बार-बार अपने आप नए सिरे से खोज निकालती है — दायरे, स्वामित्व या भूमिका की स्पष्टता के बारे में — उसे हर बार शुरू से दोबारा सीखने के बजाय स्पष्ट रूप से लिख लेना उचित है।

परिवार और समाज

  • कोई सीमा या मूल्य जिसे आप वर्षों से परिवार के एक ही सदस्य के सामने दोहराते रहते हैं, इस बात का संकेत नहीं है कि आप अपनी बात ठीक से कह नहीं पा रहे — कुछ बातों को नए शब्दों की नहीं, बस फिर से कहे जाने की ज़रूरत होती है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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