2.47

संस्कृत

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

karmaṇy evādhikāras te mā phaleṣu kadācana mā karmaphalahetur bhūr mā te saṅgo'stv akarmaṇi

अनुवाद

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, उसके फलों पर कभी नहीं। इसलिए तुम कर्मफल के हेतु मत बनो, और अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है, और कर्म योग का औपचारिक कथन भी। आपका अधिकार स्वयं कर्म पर है — करने पर — पर उसके फल पर कभी नहीं। इसके बाद आने वाले दो वाक्यांश उन गलत अर्थों का रास्ता बंद कर देते हैं जो सहज ही निकाले जा सकते हैं: फल को अपना प्रेरक न बनाएँ, और “परिणाम मेरे वश में नहीं है” को कर्म पूरी तरह छोड़ देने का कारण न बनाएँ। यह कर्म में लगे रहते हुए, आसक्ति के बिना कर्म करने का अनुशासन है, कर्म से विरक्ति नहीं। “अधिकार” — जो “हक़” की अपेक्षा क्षेत्राधिकार के अधिक निकट है — एक प्रशासनिक शब्द है, और पूरा भार यही शब्द उठा रहा है: कृष्ण उस सीमा को रेखांकित कर रहे हैं जिस पर अर्जुन का वास्तव में शासन है। चौथा चरण निष्क्रियतावाद के बच निकलने के रास्ते को बंद कर देता है, और इसीलिए अध्याय 4 में अकर्म की परिभाषा इतनी सावधानी से देनी पड़ती है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

karmaṇy evādhikāras teकर्मण्य् एवाधिकारस् ते
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म में है (karmaṇi + eva + adhikāraḥ + te)
mā phaleṣu kadācanaमा फलेषु कदाचन
फलों में कभी नहीं (mā + phaleṣu + kadācana)
mā karmaphalahetur bhūrमा कर्मफलहेतुः भूः
कर्मफल के हेतु मत बनो (mā + karma-phala-hetuḥ + bhūḥ)
mā te saṅgo'stv akarmaṇiमा ते सङ्गोऽस्त्व् अकर्मणि
अकर्म में तुम्हारी आसक्ति न हो (mā + te + saṅgaḥ + astu + akarmaṇi)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

“Adhikāra” — rendered here as “business,” but closer to jurisdiction or authority — is an administrative word, not an emotional one. Krishna isn’t consoling Arjuna about outcomes he can’t control; he’s defining the boundary of what Arjuna actually has authority over, the way a job description defines scope. Read as a scope statement rather than a comfort statement, the verse is asking for clarity about where authority legitimately ends, not equanimity as a feeling to be summoned.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप किसी परिणाम को लेकर चिंतित हों, तो ठीक-ठीक पूछिए कि आपका वास्तविक अधिकार कहाँ समाप्त होता है — परवाह करना छोड़ देने के लिए नहीं, बल्कि उस चीज़ को सँभालने में प्रयास खर्च करना बंद करने के लिए जिसे नियंत्रित करना शुरू से ही कभी आपके अधिकार-क्षेत्र में था ही नहीं।

व्यावसायिक

  • जब आप किसी ऐसे परिणाम के लिए जवाबदेह हों जो आपके नियंत्रण से बाहर की बातों पर निर्भर करता है, तो स्पष्ट रूप से तय कीजिए कि वास्तव में किस हद तक आपका अधिकार है, और अपना पूरा प्रयास वहीं लगाइए — बाकी के बारे में चिंता करने से आपका वास्तविक दायरा नहीं बढ़ता।

परिवार और समाज

  • जब आप इस बात से चिंतित हों कि किसी और के लिए आपने जो निर्णय लिया है उसका परिणाम क्या होगा, तो स्वयं को याद दिलाइए कि आपकी वास्तविक ज़िम्मेदारी कहाँ समाप्त होती है — आप अपना हिस्सा अच्छी तरह निभाने के लिए जवाबदेह हैं, इस बात को नियंत्रित करने के लिए नहीं कि उसके बाद किसी दूसरे व्यक्ति का जीवन कैसे आगे बढ़ता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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