संस्कृत
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥
mātrāsparśās tu kaunteya śītoṣṇasukhaduḥkhadāḥ āgamāpāyino'nityās tāṃs titikṣasva bhārata
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र, इन्द्रियों और उनके विषयों के संयोग ही सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देते हैं; वे आते और जाते रहते हैं, अनित्य हैं। हे भारत, उन्हें सहन करो।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यहाँ स्वर बदल जाता है — कृष्ण मान लेते हैं कि संवेदनाएँ (सर्दी और गर्मी, सुख और दुःख) वास्तविक हैं और सचमुच आती-जाती हैं, पर वे इन्हें ऐसी चीज़ के रूप में रखते हैं जिसे सहना है, न कि गहरे तर्क के विरुद्ध प्रमाण के रूप में। यही समत्व की उस शिक्षा का बीज है जिसे श्लोक 38 स्पष्ट रूप से कहेगा: क्षणिक चीज़ें स्थायी का खंडन नहीं करतीं, वे बस वही हैं जिन्हें एक स्थिर मन को रास्ते में सहना पड़ता है। तितिक्षा — विचलित हुए बिना सहना — अपने आस-पास के अमरता वाले दावे की तुलना में एक छोटा, अधिक व्यावहारिक गुण है, और यही वह गुण है जिसका अभ्यास अर्जुन अभी से सचमुच शुरू कर सकते हैं। निर्देश यह नहीं है कि सर्दी और गर्मी को महसूस करना बंद कर दें, केवल यह है कि उन्हें मुख्य बात मानना बंद कर दें।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- mātrāsparśāsमात्रास्पर्शास्
- इन्द्रियों और विषयों के संयोग (mātrā-sparśāḥ)
- tuतु
- किन्तु
- kaunteyaकौन्तेय
- हे कुन्तीपुत्र
- śītoṣṇasukhaduḥkhadāḥशीतोष्णसुखदुःखदाः
- सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देने वाले (śīta-uṣṇa-sukha-duḥkha-dāḥ)
- āgamāpāyino'nityāsआगमापायिनोऽनित्यास्
- आने-जाने वाले, अनित्य (āgama-apāyinaḥ + anityāḥ)
- tāṃsतांस्
- उन्हें
- titikṣasvaतितिक्षस्व
- सहन करो
- bhārataभारत
- हे भरतवंशी
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
It would be easy to read this teaching as denial — pretend the pain and cold don’t register. This verse rules that reading out explicitly: sensation is granted as real, it’s just denied the status of counter-evidence. The instruction is endurance, titikṣā, not numbness — a distinction that matters, because a teaching that asked Arjuna to stop feeling would be a different, much less honest, teaching than one asking him to keep feeling and act anyway.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
Site Commentary — Second Reading
“Mātrā” — the “matter” in contact with the senses — is narrower than it looks: this verse isn’t making a claim about emotion or suffering in general, only about sensation generated by contact with physical conditions, cold, heat, the stuff a body registers automatically. That’s the same territory covered by any discipline built on sustained discomfort — a long run, a punishing stretch at work, months of interrupted sleep with a newborn — where the actual skill isn’t feeling less, it’s declining to promote a passing sensation into a verdict on how the whole effort is going. Titikṣā, in that light, is less a spiritual virtue than a working method: let the signal arrive, note it, keep moving.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आपसे कहा जाए कि आप दृढ़ बनें, तो देखें कि इसे 'इसे महसूस ही मत करो' के रूप में रखा जा रहा है या 'इसे महसूस करो और फिर भी कर्म करो' के रूप में — यह श्लोक दूसरे पर ही ज़ोर देता है। अनुभूति को नकारना, उसे स्वीकार करने और उसे अंतिम निर्णायक न बनने देने की तुलना में कहीं बुरी रणनीति है।
व्यावसायिक
- किसी कठिन दौर में टीम का मार्गदर्शन करते समय लोगों से यह न कहें कि वे ऐसा दिखाएँ मानो कठिनाई वास्तविक ही नहीं है — उनसे कहें कि वे उसे ईमानदारी से स्वीकार करें और फिर भी काम करते रहें। नकारना बेईमानी जैसा लगता है; सहन करना शक्ति जैसा लगता है, और इनमें से केवल एक ही लंबे समय तक टिक सकता है।
परिवार और समाज
- जब आपका कोई निकट व्यक्ति किसी कठिन दौर से गुज़र रहा हो, तो यह न सुझाएँ कि उसे यह महसूस नहीं करना चाहिए — यह ईमानदार माँग से कहीं कठिन माँग है; ईमानदार माँग यह है कि वह उसे पूरी तरह महसूस करे और फिर भी उससे गुज़रते हुए आगे बढ़ता रहे।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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