संस्कृत
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥
sukhaduḥkhe same kṛtvā lābhālābhau jayājayau tato yuddhāya yujyasva naivaṃ pāpam avāpsyasi
अनुवाद
सुख और दुःख, लाभ और हानि, जय और पराजय को समान मानकर फिर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ; इस प्रकार तुम्हें पाप नहीं लगेगा।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह उस बात का पहला कथन है जो आगे चलकर इस अध्याय की केंद्रीय व्यावहारिक शिक्षा बनती है: सुख और दुःख, लाभ और हानि, जय और पराजय को समान मानिए, और फिर कर्म कीजिए। यह स्वभाव के रूप में परिणाम के प्रति उदासीनता नहीं है — यह एक अनुशासन है: कर्म में पूरी तरह लगें, पर अपेक्षित परिणाम कर्म करने के निर्णय को विकृत न करे। श्लोक 47–48 इसी विचार पर लौटते हैं और इसे इसका पारिभाषिक नाम देते हैं — योग। तीन विपरीत जोड़े — सुख/दुःख, लाभ/अलाभ, जय/अजय — वही बहीखाता हैं जो एक योद्धा वास्तव में रखता है, और कृष्ण कहते हैं कि कर्म करने से पहले इस बहीखाते को शून्य कर दिया जाए, यह नहीं कि कर्म ही छोड़ दिया जाए। यही कर्तव्य वाले तर्क से समत्व तक का सेतु है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- sukhaduḥkhe same kṛtvāसुखदुःखे समे कृत्वा
- सुख और दुःख को समान मानकर (sukha-duḥkhe + same + kṛtvā)
- lābhālābhauलाभालाभौ
- लाभ और हानि (lābha-alābhau)
- jayājayauजयाजयौ
- जय और पराजय (jaya-ajayau)
- tatoततो
- तब
- yuddhāyaयुद्धाय
- युद्ध के लिए
- yujyasvaयुज्यस्व
- तैयार हो जाओ
- naivaṃ pāpam avāpsyasiनैवं पापं अवाप्स्यसि
- इस प्रकार तुम पाप को प्राप्त नहीं करोगे (na + evam + pāpam + avāpsyasi)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
This verse arrives one line after Krishna offered Arjuna heaven or earth as reasons to fight — and immediately asks him to hold gain and loss as equal. The consequentialist bait of verse 37 turns out to be a stepping stone, not the destination; Krishna meets Arjuna where his motivation currently is, then immediately raises the bar past it, toward a discipline that no longer needs the reward to function.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- यदि किसी कठिन काम में खुद को आगे बढ़ाने के लिए आपको किसी लुभावने परिणाम की ज़रूरत पड़ी, तो शुरुआत के लिए यह ठीक है — पर वहीं रुकिए मत। एक बार शुरुआत कर लेने के बाद, अधिक टिकाऊ अनुशासन यह है कि परिणाम चाहे जो भी हो, आप काम को अच्छी तरह करें।
व्यावसायिक
- यदि आपने किसी विशेष प्रोत्साहन के सहारे किसी टीम को एक कठिन परियोजना के लिए प्रतिबद्ध होने को प्रेरित किया, तो समय के साथ टीम की संस्कृति को उस प्रोत्साहन से आगे ले जाने की योजना बनाइए — ऐसे काम की ओर जो अच्छी तरह किया जाए, चाहे वह विशेष परिणाम सामने आए या नहीं, क्योंकि प्रोत्साहन के समाप्त होने पर अनुशासन भी उसके साथ समाप्त नहीं होना चाहिए।
परिवार और समाज
- यदि किसी पुरस्कार या वादा किए गए परिणाम ने आपके मार्गदर्शन में चल रहे किसी व्यक्ति को कोई कठिन काम शुरू करने के लिए प्रेरित किया, तो उसका उपयोग कीजिए, पर लक्ष्य यह रखिए कि समय के साथ वह स्वयं कर्म करने में ही स्थिरता पाना सीखे — ताकि जिस दिन वह विशेष परिणाम मिलना बंद हो जाए, उस दिन उसका प्रयास बिखर न जाए।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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विषय
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