संस्कृत
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥
vāsāṃsi jīrṇāni yathā vihāya navāni gṛhṇāti naro'parāṇi tathā śarīrāṇi vihāya jīrṇāny anyāni saṃyāti navāni dehī
अनुवाद
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्र ग्रहण कर लेता है, वैसे ही देही पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
इस अध्याय में सबसे अधिक उद्धृत किया जाने वाला बिंब यही है। जैसे कोई व्यक्ति पुराने कपड़े उतारकर नए कपड़े पहन लेता है और उसे कुछ खोने का भाव नहीं होता, वैसे ही देहधारी आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती है। यह उपमा दार्शनिक दृष्टि से सार्थक है: वस्त्र पहनने वाले के लिए आनुषंगिक होते हैं, उससे अभिन्न नहीं — और कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि वे आत्मा के संबंध में शरीर को भी इसी तरह देखें। शब्द देही — “वह जिसके पास शरीर है” — अपने आप में संक्षेप में पूरा तर्क है: यह आत्मा को उस शरीर से भिन्न बताकर नाम देता है, जिसे वह केवल पहनती है। वस्त्र की यह उपमा बाद की परम्परा में बार-बार इसीलिए आती है, क्योंकि यह पुनर्जन्म को विचित्र या रहस्यमय नहीं, बल्कि सामान्य बात जैसा बना देती है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- vāsāṃsi jīrṇāniवासांसि जीर्णानि
- पुराने वस्त्र (vāsāṃsi + jīrṇāni)
- yathāयथा
- जैसे
- vihāyaविहाय
- त्यागकर
- navāni gṛhṇātiनवानि गृह्णाति
- नए ग्रहण करता है (navāni + gṛhṇāti)
- naro'parāṇiनरोऽपराणि
- मनुष्य, दूसरे [वस्त्र] (naraḥ + aparāṇi)
- tathāतथा
- वैसे ही
- śarīrāṇiशरीराणि
- शरीरों को
- vihāyaविहाय
- त्यागकर
- jīrṇānyजीर्णान्य्
- पुराने
- anyāni saṃyāti navāniअन्यानि संयाति नवानि
- दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है (anyāni + saṃyāti + navāni)
- dehīदेही
- देहधारी आत्मा
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
After five straight verses of dense, technical metaphysics, this verse suddenly drops to the most ordinary image available — changing clothes. That’s a pacing choice, not an accident: the argument keeps checking itself against something anyone can picture, as if it doesn’t trust abstraction alone to do the convincing and periodically comes back down to ground level to make sure it hasn’t lost its audience.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप किसी कठिन, अमूर्त विचार को समझने का प्रयास कर रहे हों, तो बीच-बीच में उसे सबसे साधारण चित्र में बदलकर देखें जो आपको मिल सके — यदि आप ऐसा नहीं कर पाते, तो यह इस बात का संकेत है कि वह विचार अभी सचमुच ऐसी चीज़ नहीं बना है जिसे आप समझते हैं, बल्कि केवल ऐसी चीज़ बना है जिसे आप दोहरा सकते हैं।
व्यावसायिक
- जब आप हितधारकों को कोई जटिल तकनीकी अवधारणा समझा रहे हों, तो बहुत देर तक अमूर्त बातों में न रहें — बीच-बीच में सबसे साधारण उपमा पर उतर आएँ, ताकि जाँच सकें कि सुनने वाले अब भी आपके साथ हैं या नहीं, ठीक वैसे ही जैसे यह श्लोक गहन तर्क और एक सीधे-सादे चित्र को बारी-बारी से रखता है।
परिवार और समाज
- जब आप किसी प्रियजन को कोई जटिल बात समझाने का प्रयास कर रहे हों, तो केवल उसके अमूर्त रूप पर ही आगे न बढ़ते जाएँ — बीच-बीच में उसे रोज़मर्रा के सबसे सरल चित्र में बदलकर रखें, ताकि यह भी जाँच सकें कि वे अब भी समझ पा रहे हैं, और यह भी सुनिश्चित कर सकें कि आप स्वयं उसे सचमुच समझते हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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