2.20

संस्कृत

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥

na jāyate mriyate vā kadācin nāyaṃ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ ajo nityaḥ śāśvato'yaṃ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre

अनुवाद

यह न कभी जन्म लेता है और न कभी मरता है; न ऐसा है कि यह होकर फिर न रहे। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

पूरी गीता का केंद्रीय तत्त्वमीमांसीय दावा यह है: जो आत्मा (आत्मन्) शरीर को सजीव करती है, वह ऐसी वस्तु नहीं है जो जन्म लेती हो या मरती हो। शरीर आरंभ होते हैं और समाप्त होते हैं; उनमें रहने वाली आत्मा नहीं। कृष्ण इसे सांत्वना के रूप में उतना नहीं कह रहे, जितना एक श्रेणी-दोष को सुधारने के लिए — अर्जुन उस बात पर शोक कर रहे हैं जिसे वे व्यक्तियों का विनाश समझते हैं, जबकि युद्धभूमि पर वास्तव में जो होता है वह शरीरों का विनाश है। यह श्लोक वह धुरी है जिस पर युद्ध करने के पक्ष में पूरे अध्याय का तर्क घूमता है: यदि आत्मा को मारा नहीं जा सकता, तो मारना वह नहीं है जो मारने वाला उसे समझता है। पाँचों विशेषण — अजन्मा, नित्य, शाश्वत, पुरातन, अमर — बिना किसी संयोजक के एक के बाद एक रखे गए हैं, उसी तरह जैसे गीता 2.24 अपनी सूची को रखेगा। यहाँ आत्मा को लगभग पूरी तरह निषेध के द्वारा, और इस बात से परिभाषित किया गया है कि काल उसका क्या नहीं कर सकता।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

na jāyateन जायते
जन्म नहीं लेता (na + jāyate)
mriyate vāंरियते वा
और न मरता है (mriyate + vā)
kadācinकदाचिन्
कभी भी
nāyaṃ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥनायं भूत्वा भविता वा न भूयः
न ही ऐसा है कि यह होकर फिर नहीं रहेगा (na + ayam + bhūtvā + bhavitā + vā + na + bhūyaḥ)
ajoअजो
अजन्मा
nityaḥनित्यः
नित्य
śāśvato'yaṃशाश्वतोऽयं
यह शाश्वत (śāśvataḥ + ayam)
purāṇoपुराणो
पुरातन
na hanyateन हन्यते
मारा नहीं जाता (na + hanyate)
hanyamāneहन्यमाने
मारे जाने पर
śarīreशरीरे
शरीर के

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Notice that even while making the case that killing doesn’t touch the self, Krishna doesn’t reach for gentler language — “the body is slaughtered,” not “passes away” or something softer. The philosophical argument that should make violence easier to accept is delivered without softening the violence itself, which suggests the point isn’t to make killing feel smaller, only to correctly locate what it does and doesn’t reach.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप किसी ऐसे कठिन सत्य को स्वीकार करने की कोशिश कर रहे हों जो किसी कठिन कर्म को अधिक सहने योग्य बना देता है, तो सत्य के ऐसे किसी भी रूप पर संदेह करें जो उस कर्म को भी उससे छोटा बताने लगे जितना वह वास्तव में है — सच्चा रूप उसे नए ढंग से देखते हुए भी, आप जो कर रहे हैं उसके भार को पूरा बनाए रखता है।

व्यावसायिक

  • जब आप किसी कठिन निर्णय — छँटनी, कामकाज बंद करना, दिशा में कोई कठिन बदलाव — के पक्ष में तर्क रखें, तो उसकी कीमत बताने वाली भाषा को नरम न करें ताकि निर्णय को स्वीकार करना आसान हो जाए। यह तर्क रखते हुए भी कि यही सही निर्णय है, उस कर्म का वास्तविक भार सामने बनाए रखें।

परिवार और समाज

  • जब आप किसी को एक दुखद अनिवार्यता स्वीकार करने में मदद कर रहे हों, तो जो वास्तव में खोया जा रहा है उसके बारे में भाषा को नरम न करें — उसे साफ़-साफ़ कहना, यह बताते हुए भी कि फिर भी यही सही मार्ग क्यों है, पूरी बात को ईमानदार बनाए रखता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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