2.19

संस्कृत

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥

ya enaṃ vetti hantāraṃ yaś cainaṃ manyate hatam ubhau tau na vijānīto nāyaṃ hanti na hanyate

अनुवाद

जो इसे मारने वाला समझता है और जो इसे मारा गया मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते। यह न मारता है और न मारा जाता है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह कठ उपनिषद (गीता से पुराना एक वैदिक ग्रंथ) की एक प्रसिद्ध पंक्ति का लगभग ज्यों-का-त्यों उद्धरण है, जो दोहरा काम करता है: यह अमरता के तर्क को एक बार फिर उसके सबसे तीखे रूप में दोहराता है, और चुपचाप यह संकेत भी देता है कि यहाँ कृष्ण की शिक्षा कोई नया प्रकटीकरण नहीं, बल्कि स्थापित वैदिक ज्ञान का पुनर्कथन है, जिसे अर्जुन सिद्धांततः पहले से जान सकता था।

दोनों भूलों को भूल ही कहा गया है: यह सोचना कि आप मार सकते हैं, और यह सोचना कि आपको मारा जा सकता है। इसी समरूपता का उपयोग गीता 2.21 करता है, जब वह पूछता है कि ऐसा व्यक्ति “कैसे मारता है या मरवाता है” — यह श्लोक मारने की अवधारणा को दोनों छोरों से एक साथ ढहा देता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

ya enaṃ vetti hantāraṃय एनं वेत्ति हन्तारं
जो इसे मारने वाला समझता है (yaḥ + enam + vetti + hantāram)
yaś cainaṃ manyate hatamयश् चैनं मन्यते हतं
और जो इसे मारा गया मानता है (yaḥ + ca + enam + manyate + hatam)
ubhau tauउभौ तौ
वे दोनों (ubhau + tau)
na vijānītoन विजानीतो
नहीं जानते (na + vijānītaḥ)
nāyaṃनायं
यह नहीं (na + ayam)
hantiहन्ति
मारता है
na hanyateन हन्यते
न मारा जाता है (na + hanyate)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The verse corrects two mirror-image errors, not one. Arjuna has been worried only about the slayer’s side of the equation — what it means for him to kill; this verse names the exact same confusion in imagining oneself as the one slain. Both errors share a root, mistaking the self for something that can occupy the position of agent or victim in an act of destruction at all.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

इस श्लोक को अपनाएँ

पाठ

व्यक्तिगत

  • ध्यान दें कि कब आप किसी पीड़ादायक स्थिति में केवल अपनी भूमिका की जाँच कर रहे होते हैं — मान लीजिए, नुकसान पहुँचाने का अपराध-बोध — और यह अनदेखा कर देते हैं कि दूसरे पक्ष को आप जिस तरह देख रहे हैं, उसमें भी ठीक वैसा ही उलटा भ्रम है। अक्सर इन दोनों ही दृष्टियों के मूल में एक ही भूल होती है।

व्यावसायिक

  • किसी घटना की जाँच करते समय केवल उसी के कार्यों की छानबीन न करें जिसने उसे शुरू किया — यह भी देखें कि सिस्टम के 'पीड़ित' पक्ष (जो सेवा ठप हो गई, जिस टीम को अलर्ट मिला) को भी कहीं उतने ही भ्रमित ढंग से तो नहीं देखा जा रहा। एक जैसी उलटी-सीधी भूलों की जड़ में अक्सर एक ही कारण होता है।

परिवार और समाज

  • किसी विवाद में केवल नुकसान पहुँचाने वाले के रूप में अपनी भूमिका पर ही प्रश्न न उठाएँ — यह भी देखें कि कहीं आप दूसरे व्यक्ति की भूमिका को भी उतना ही गलत तो नहीं समझ रहे। ये दोनों विकृतियाँ प्रायः एक ही मूल ग़लतफ़हमी से पैदा होती हैं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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