11.8

संस्कृत

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥

na tu māṃ śakyase draṣṭum anenaiva svacakṣuṣā divyaṃ dadāmi te cakṣuḥ paśya me yogam aiśvaram

अनुवाद

किंतु तुम अपनी इन आँखों से मुझे नहीं देख सकते। मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूँ। मेरे ऐश्वर्यमय योग को देखो।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

पूरे आरम्भिक अंश का यांत्रिक दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण श्लोक: साधारण मानवीय दृष्टि (स्वचक्षुषा, “अपनी ही आँखों से”) को स्पष्ट रूप से अपर्याप्त कहकर अलग कर दिया गया है, और कुछ भी दिखाए जाने से पहले कृष्ण को अर्जुन को एक अलग क्षमता — दिव्य चक्षु, यानी दिव्य नेत्र — प्रदान करनी पड़ती है। यह कथा की एक सोची-समझी व्यवस्था है: पाठ आपको पहले से बता रहा है कि आगे जो आने वाला है वह साधारण बोध की पहुँच में नहीं है, इसलिए आगे के श्लोकों में अर्जुन के अभिभूत हो जाने को किसी भी रूप में साहस की कमी नहीं समझना चाहिए। उसके साधन उन्नत कर दिए गए थे, और फिर भी वह लगभग टूट जाता है। यांत्रिक दृष्टि से निर्णायक श्लोक: साधारण दृष्टि को अलग कर दिया जाता है, और कुछ भी दिखाए जाने से पहले एक अलग क्षमता — दिव्य चक्षु — प्रदान की जानी आवश्यक है। पाठ आपको पहले से बता देता है कि आगे का कुछ भी साहस की कमी नहीं है: साधन उन्नत कर दिए गए, फिर भी वह लगभग टूट जाता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

na tu māṃ śakyase draṣṭumन तु मां शक्यसे द्रष्टुं
किंतु तुम मुझे देख नहीं सकते (na + tu + mām + śakyase + draṣṭum)
anenaiva svacakṣuṣāअनेनैव स्वचक्षुषा
अपनी इसी आँख से (anena + eva + sva-cakṣuṣā)
divyaṃ dadāmi te cakṣuḥदिव्यं ददामि ते चक्षुः
मैं तुम्हें दिव्य नेत्र देता हूँ (divyam + dadāmi + te + cakṣuḥ)
paśya me yogam aiśvaramपश्य मे योगं ऐश्वरं
मेरा ऐश्वर्यमय योग देखो (paśya + me + yogam + aiśvaram)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

This capacity isn’t earned by Arjuna’s effort — it’s simply given, mid-sentence, because the plain fact is his own eyes were never going to be enough no matter how hard he tried to see harder. That’s a quieter claim than it looks: some kinds of readiness aren’t built by trying, they’re granted by someone or something outside the person who needs them, and no amount of self-improvement substitutes for the thing actually being provided.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप किसी चीज़ को देखने-समझने या सँभालने के लिए पूरा ज़ोर लगा रहे हों और फिर भी बात न बन रही हो, तो सोचिए कि शायद कमी प्रयास की नहीं है — कुछ परिस्थितियों में बिल्कुल अलग तरह की सहायता या देखने का बिल्कुल अलग दृष्टिकोण चाहिए, न कि वही काम और ज़्यादा ज़ोर लगाकर करना जो आप पहले से कर रहे हैं।

व्यावसायिक

  • यदि कोई टीम अपने मौजूदा साधनों से कितना भी गहरा विश्लेषण कर ले, फिर भी किसी व्यवस्थागत समस्या को देख न पा रही हो, तो इसका समाधान शायद नए मापक साधन या बिल्कुल अलग दृष्टिकोण में है, न कि उन्हीं डैशबोर्ड पर और अधिक मेहनत करने में।

परिवार और समाज

  • यदि आपका कोई प्रिय व्यक्ति, दोनों ओर से सच्चे प्रयास के बावजूद, वह नहीं देख पा रहा जो आप उसे दिखाना चाहते हैं, तो उसे समझने का सचमुच कोई अलग रास्ता दें — कोई अलग माहौल, कोई अलग माध्यम — बजाय इसके कि आप वही बात और ज़ोर देकर दोहराते रहें।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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