संस्कृत
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि । दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥
daṃṣṭrākarālāni ca te mukhāni dṛṣṭvaiva kālānalasannibhāni diśo na jāne na labhe ca śarma prasīda deveśa jagannivāsa
अनुवाद
दाढ़ों के कारण विकराल और काल की अग्नि के समान आपके मुखों को देखते ही मुझे दिशाओं का ज्ञान नहीं रहा और न ही मुझे कहीं शरण मिल रही है। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न होइए।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
“कालानल”, अर्थात् काल/मृत्यु की अग्नि, यहाँ दाढ़ों वाले मुखों की उपमा के रूप में आती है। इससे सात श्लोक पहले ही उस प्रत्यक्ष आत्म-परिचय की झलक मिल जाती है जो कृष्ण श्लोक 32 में देते हैं (“कालोऽस्मि”, मैं काल हूँ)। बताए जाने से पहले ही अर्जुन सहज बोध से समझ चुके हैं कि वे क्या देख रहे हैं। श्लोक अध्याय में पहली बार खुलकर दया की याचना (प्रसीद) पर समाप्त होता है। अब वर्णन की जगह विनती ने ले ली है, और यह विनती तब तक पूरी तरह नहीं थमेगी जब तक कृष्ण श्लोक 49 में रुकने के लिए मान नहीं जाते। काल-अनल, यानी “काल की अग्नि”, यहाँ दाढ़ों वाले मुखों की उपमा के रूप में आती है। यह कृष्ण के प्रत्यक्ष कालोऽस्मि से सात श्लोक पहले है। अर्जुन सहज बोध से समझ चुके हैं कि वे क्या देख रहे हैं। श्लोक अध्याय के पहले खुले प्रसीद, “कृपा करें”, पर समाप्त होता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- daṃṣṭrākarālāni ca te mukhāniदंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि
- और दाढ़ों से विकराल आपके मुख (daṃṣṭrā-karālāni + ca + te + mukhāni)
- dṛṣṭvaiva kālānalasannibhāniदृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि
- कालाग्नि के समान उन्हें देखते ही (dṛṣṭvā + eva + kāla-anala-sannibhāni)
- diśo na jāne na labhe ca śarmaदिशो न जाने न लभे च शर्म
- मैं दिशाओं को नहीं जानता और न ही मुझे शांति मिलती है (diśaḥ + na + jāne + na + labhe + ca + śarma)
- prasīda deveśa jagannivāsaप्रसीद देवेश जगन्निवास
- प्रसन्न होइए, हे देवेश, हे जगन्निवास (prasīda + deva-īśa + jagat-nivāsa)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Back in verse 3, Arjuna asked to verify by sight something he’d only had by report. Here the direction runs the other way: he arrives, through raw perception alone, at an identification — this is Time, this is Death — seven verses before Krishna ever says the words “kālo’smi” aloud in verse 32. Direct experience gets there first; the verbal confirmation only catches up afterward, closing a loop the chapter opened on the opposite footing.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब प्रत्यक्ष अनुभव आपको किसी निष्कर्ष तक पहुँचा दे, इससे पहले कि किसी ने वह बात आपसे शब्दों में कही हो, तो उस पर भरोसा करें — कभी-कभी अनुभूति सत्य तक पहले पहुँच जाती है, और स्पष्ट पुष्टि बस उसी तक पहुँच रही होती है जिसे आप पहले ही महसूस कर चुके थे।
व्यावसायिक
- जब किसी व्यवस्था को सीधे देखने-परखने से बनी आपकी सहज समझ किसी निष्कर्ष तक पहुँच जाए, इससे पहले कि आँकड़े या कोई रिपोर्ट उसकी पुष्टि करें, तो उसे केवल इसलिए नज़रअंदाज़ न करें कि आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं आई है — प्रत्यक्ष अनुभव कभी-कभी वहाँ पहले पहुँच जाता है।
परिवार और समाज
- यदि आप अपने किसी निकट व्यक्ति के बारे में कोई सच्ची बात उसके शब्दों में कहने से बहुत पहले ही महसूस कर लेते हैं, तो उस अंतर्ज्ञान पर वास्तविक जानकारी की तरह भरोसा करें — किसी व्यक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव अक्सर सत्य तक उसकी अपनी पुष्टि से पहले पहुँच जाता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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