संस्कृत
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्तात् लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः । तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रम् भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥
lelihyase grasamānaḥ samantāt lokān samagrān vadanair jvaladbhiḥ tejobhir āpūrya jagat samagram bhāsas tavogrāḥ pratapanti viṣṇo
अनुवाद
हे विष्णु, आप अपने जलते हुए मुखों से समस्त लोकों को चारों ओर से निगलते हुए चाट रहे हैं। आपकी उग्र प्रभाएँ सम्पूर्ण जगत् को तेज से भरकर तपा रही हैं।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
“लेलिह्यसे” — आप चाट रहे हैं — यह बिम्ब को दाँतों और जबड़ों से आगे ले जाकर सीधी भूख तक पहुँचा देता है। यह क्रिया केवल किसी यंत्र की तरह चलने की नहीं, बल्कि स्वाद लेने की है। और सीधा संबोधन “विष्णो” पर आकर टिकता है, यानी नाम लेकर विष्णु को पुकारा गया है। यही पहचान श्लोक 24 पहले ही करा चुका है। यह विराट शरीर कोई सामान्य दिव्यता नहीं है। यह ठीक-ठीक पालन करने वाले देवता का रूप है, जो भक्षक बन गया है। भूख और पालन करने वाली शक्ति यहाँ एक ही वस्तु के दो चेहरों के रूप में प्रकट होती हैं। अब ब्योरे की जगह पूरी तरह विस्तार ने ले ली है। बात अब योद्धाओं की नहीं रही, बात “जगत् समग्रम्” की है, यानी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की, जो उनके तेज से जल रहा है। लेलिह्यसे — “आप चाटते हैं” — यांत्रिकता से आगे बढ़कर सीधी भूख तक पहुँचता है। संबोधन “विष्णु” को है: पालनकर्ता देवता का रूप भक्षक के रूप में प्रकट होता है, और भूख तथा पालन करने वाली शक्ति एक ही वस्तु के दो चेहरे बन जाती हैं। ब्योरे की जगह विस्तार ने ले ली है — अब “सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड” जल रहा है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- lelihyase grasamānaḥ samantātलेलिह्यसे ग्रसमानः समन्तात्
- सब ओर से निगलते हुए आप चाट रहे हैं (lelihyase + grasamānaḥ + samantāt)
- lokān samagrān vadanair jvaladbhiḥलोकान् समग्रान् वदनैः ज्वलद्भिः
- समस्त लोकों को, जलते हुए मुखों से (lokān + samagrān + vadanaiḥ + jvaladbhiḥ)
- tejobhir āpūrya jagat samagramतेजोभिः आपूर्य जगत् समग्रं
- सम्पूर्ण जगत को तेज से भरकर (tejobhiḥ + āpūrya + jagat + samagram)
- bhāsas tavogrāḥ pratapanti viṣṇoभासस् तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो
- हे विष्णु, आपकी उग्र किरणें तपा रही हैं (bhāsaḥ + tava + ugrāḥ + pratapanti + viṣṇo)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Calling this figure “Viṣṇo” by name, rather than by any of the vaguer titles used earlier, forces the preserving and devouring functions into the same identity rather than letting readers imagine a separate destroyer god has stepped in. The poem isn’t introducing a new deity for this violent turn — it’s insisting the sustainer was always capable of this, which is a harder thing to sit with than a stranger’s cruelty would be.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- जिस नौकरी, रिश्ते या व्यवस्था ने आपको वर्षों तक संभाले रखा, वही अंततः उस अध्याय को निगल भी सकती है या समाप्त भी कर सकती है — इसे ऐसा विश्वासघात मानने की इच्छा से बचें जिसके लिए किसी खलनायक की ज़रूरत हो; संभालना और समाप्त करना एक ही स्रोत से आ सकते हैं।
व्यावसायिक
- जिस बाज़ार, तकनीक या मैनेजर ने आपके करियर की शुरुआती प्रगति की नींव रखी, वही बाद में उसे उलट-पुलट करने वाली शक्ति भी बन सकता है — ऐसे योजना बनाइए मानो संभालने वाली शक्ति और उलट-पुलट करने वाली शक्ति एक ही निकल सकती हैं, न कि ऐसे अलग-अलग ख़तरे जिन पर नज़र रखनी हो।
परिवार और समाज
- माता-पिता या जीवनसाथी की स्थिर उपस्थिति और आपको चोट पहुँचाने की उनकी क्षमता ऐसे विरोधाभास नहीं हैं जिन्हें सुलझाकर 'अच्छा' या 'बुरा' ठहराना ज़रूरी हो — जो निकटता किसी रिश्ते को संभाले रखती है, वही उसे घाव देने की शक्ति भी देती है; दोनों एक साथ सच हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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