संस्कृत
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव । तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥
kirīṭinaṃ gadinaṃ cakrahastam icchāmi tvāṃ draṣṭum ahaṃ tathaiva tenaiva rūpeṇa caturbhujena sahasrabāho bhava viśvamūrte
अनुवाद
मैं आपको वैसे ही मुकुट धारण किए, हाथ में गदा और चक्र लिए देखना चाहता हूँ। हे सहस्रबाहु, हे विश्वमूर्ति, आप उसी चतुर्भुज रूप में हो जाइए।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि अर्जुन ठीक-ठीक क्या माँगते हैं — अभी साधारण, दो भुजाओं वाले मानव सारथी को नहीं, बल्कि मुकुट, गदा और चक्र से युक्त चतुर्भुज रूप को: स्पष्ट रूप से दिव्य, स्पष्ट रूप से विष्णु के प्रतिमा-विधान वाला, पर अनंत के बजाय सीमित और परिचित। मानव कृष्ण की ओर पूरी वापसी श्लोक 50 और 51 तक नहीं होती; यह याचना उतरने के क्रम में बीच के एक पड़ाव को चिह्नित करती है — एक ऐसा रूप जिसे अर्जुन “देव” कहकर संबोधित कर सकें, और जो पूरे क्षितिज को उस तरह न निगल ले जैसे विराट दर्शन ने निगल लिया है। स्वयं यह याचना भी परम विशेषणों को पूरी तरह छोड़ नहीं पाती — “सहस्रबाहो”, हज़ार भुजाओं वाले — मानो विस्मय की शब्दावली ने उन्हें अभी पूरी तरह मुक्त नहीं किया है। अर्जुन अभी दो भुजाओं वाले सारथी को नहीं, बल्कि चतुर्भुज विष्णु को माँगते हैं — स्पष्ट रूप से दिव्य, पर सीमित और परिचित। उतरने के क्रम में बीच का एक पड़ाव; याचना में भी एक परम विशेषण बना रहता है, सहस्रबाहो, “हज़ार भुजाओं वाले”।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- kirīṭinaṃ gadinaṃ cakrahastamकिरीटिनं गदिनं चक्रहस्तं
- मुकुटधारी, गदाधारी, हाथ में चक्र लिए (kirīṭinam + gadinam + cakra-hastam)
- icchāmi tvāṃ draṣṭum ahaṃ tathaivaइच्छामि त्वां द्रष्टुं अहं तथैव
- मैं आपको वैसे ही देखना चाहता हूँ (icchāmi + tvām + draṣṭum + aham + tathā + eva)
- tenaiva rūpeṇa caturbhujenaतेनैव रूपेण चतुर्भुजेन
- उसी चतुर्भुज रूप से (tena + eva + rūpeṇa + catur-bhujena)
- sahasrabāho bhava viśvamūrteसहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते
- हो जाइए, हे सहस्रबाहु, हे विश्वमूर्ति (sahasra-bāho + bhava + viśva-mūrte)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
There’s a small contradiction worth noticing in the ask itself: Arjuna requests the bounded four-armed form, but addresses the request to “sahasrabāho,” thousand-armed — a superlative, not a limit. Even the language of stepping back down carries a trace of the vocabulary he’s trying to step back down from, which suggests how incompletely a mind can disengage from awe even while actively asking to.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप किसी तीव्र अनुभव से पीछे हटकर किसी अधिक सँभलने योग्य स्थिति की ओर लौटने का प्रयास कर रहे हों, तो एकदम साफ़ अलगाव की अपेक्षा न करें — संभवतः आप उस छोटे रूप का वर्णन भी उसी तीव्रता से उधार ली गई भाषा में करेंगे जिससे आप नीचे उतर रहे हैं, और यह एक सामान्य, अधूरा संक्रमण है।
व्यावसायिक
- जब कोई टीम संकट की स्थिति से सामान्य कामकाज की लय में लौटने का अनुरोध करे, तो यह अपेक्षा रखें कि संकट की कुछ भाषा और आदतें उस शांत अनुरोध में भी कुछ समय तक बनी रहेंगी — तनाव घटाने का अनुरोध स्वयं शायद ही कभी पूरी तरह तनावमुक्त होकर आता है।
परिवार और समाज
- परिवार में किसी तीव्र संघर्ष के बाद, जब कोई 'फिर से सामान्य होने' की बात कहे, तो यह अपेक्षा न करें कि उनका यह अनुरोध स्वयं पूरी तरह शांत सुनाई देगा — नीचे उतरने के उस अनुरोध में भी कुछ उग्र भाषा बनी रहेगी, और यह शांत होने की प्रक्रिया का एक सामान्य हिस्सा है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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