संस्कृत
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रम् महाबाहो बहुबाहूरुपादम् । बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालम् दृष्ट्वा लोका प्रव्यथितास्तथाऽहम् ॥
rūpaṃ mahat te bahuvaktranetraṃ mahābāho bahubāhūrupādam bahūdaraṃ bahudaṃṣṭrākarālaṃ dṛṣṭvā lokāḥ pravyathitās tathāham
अनुवाद
हे महाबाहो, आपके इस महान रूप को देखकर सारे लोक व्यथित हो रहे हैं, और मैं भी। इसमें बहुत-से मुख और नेत्र हैं, बहुत-सी भुजाएँ, जंघाएँ और चरण हैं, बहुत-से उदर हैं, और बहुत-सी दाढ़ों के कारण यह विकराल है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
अर्जुन अंततः अपनी दशा को साफ़-साफ़ कह देता है — “प्रव्यथितास् तथाहम्”, लोक भयभीत हैं, और वैसे ही मैं भी — और स्वयं को उसी डरी हुई भीड़ में शामिल कर लेता है जिसका वर्णन करने में उसने अभी दो श्लोक लगाए हैं। यह स्वीकारोक्ति में एक छोटा पर वास्तविक मोड़ है: अब तक वह वही बता रहा था जो वह देखता है; यहाँ, इस अध्याय में पहली बार, वह बताता है कि वह क्या अनुभव करता है, और एक ही वाक्य में कथा के भीतर दोनों को बराबर महत्त्व दिया गया है। प्रव्यथितास् तथाहम् — “लोक काँप रहे हैं, और मैं भी” — अर्जुन स्वयं को उस डरी हुई भीड़ में शामिल कर लेता है जिसका वह वर्णन करता आ रहा है। अध्याय में पहली बार वह बताता है कि वह क्या अनुभव करता है, और इसे उतना ही महत्त्व दिया गया है जितना उसे जो वह देखता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- rūpaṃ mahat te bahuvaktranetraṃरूपं महत् ते बहुवक्त्रनेत्रं
- अनेक मुखों और नेत्रों वाला आपका विशाल रूप (rūpam + mahat + te + bahu-vaktra-netram)
- mahābāho bahubāhūrupādamमहाबाहो बहुबाहूरुपादं
- हे महाबाहो, अनेक भुजाओं, जंघाओं और चरणों वाला (mahā-bāho + bahu-bāhu-ūru-pādam)
- bahūdaraṃ bahudaṃṣṭrākarālaṃबहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं
- अनेक उदरों वाला, अनेक दाढ़ों से विकराल (bahu-udaram + bahu-daṃṣṭrā-karālam)
- dṛṣṭvā lokāḥ pravyathitās tathāhamदृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास् तथाहं
- जिसे देखकर लोक काँप उठे हैं, और वैसे ही मैं भी (dṛṣṭvā + lokāḥ + pravyathitāḥ + tathā + aham)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Notice the order inside the sentence itself: the catalog of terrifying features comes first, and only in the final two words — “tathāham,” and so am I — does Arjuna admit his own state. That ordering isn’t unique to this verse; across his whole outpouring he consistently reports the external vision in full before naming what it’s doing to him, as if the feeling only earns its place in the sentence once the evidence for it has been laid out first.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप किसी कठिन भावना को अपने लिए या किसी और के सामने शब्द देने की कोशिश कर रहे हों, तो भावना का नाम लेने से पहले साफ़-साफ़ यह बता देना मददगार हो सकता है कि असल में उसे किस बात ने जगाया — जब उसका कारण पूरी तरह कह दिया जाता है, तो उस भावना को अपनाना अक्सर आसान हो जाता है।
व्यावसायिक
- नेतृत्व के सामने कोई चिंता रखते समय, उसके बारे में अपनी आशंका का नाम लेने से पहले ठोस प्रमाण पूरे के पूरे सामने रखें — जब वे तथ्य, जिनसे यह भावना पैदा हुई, पहले से सबके सामने हों, तभी वह भावना विश्वसनीय लगती है, इसके उलट क्रम में नहीं।
परिवार और समाज
- जब आप अपने किसी करीबी को बता रहे हों कि किसी बात से आपको कैसा लगा, तो पहले पूरी स्थिति का वर्णन करने की कोशिश करें और भावना का नाम सबसे अंत में लें — सामने वाले व्यक्ति के पास पूरी तस्वीर आने से पहले ही भावना से शुरुआत करने की तुलना में, यह बात अक्सर ज़्यादा स्पष्ट रूप से पहुँचती है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
स्वयं से पूछें
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