11.5

संस्कृत

पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥

paśya me pārtha rūpāṇi śataśo'tha sahasraśaḥ nānāvidhāni divyāni nānāvarṇākṛtīni ca

अनुवाद

हे पार्थ, मेरे सैकड़ों और हज़ारों रूपों को देखो, जो अनेक प्रकार के, दिव्य और अनेक रंगों तथा आकृतियों वाले हैं।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

कृष्ण तुरंत उत्तर देते हैं — न कोई हिचकिचाहट, न इस पर कोई मोल-भाव कि अर्जुन तैयार है या नहीं। पर उत्तर के व्याकरण पर ही ध्यान दें: अर्जुन ने “आपका रूप” (एकवचन, श्लोक 3) देखने की इच्छा की थी, और बदले में जो दिया जाता है वह है “रूप” — बहुवचन में, सैकड़ों, हज़ारों, पहले ही शब्द से। यह बेमेल पूरे अध्याय का लघु रूप है: देखने के लिए एक आकार होना ही नहीं था। अर्जुन ने वह रूप, एकवचन में, देखना चाहा था (गीता 11.3); कृष्ण पहले ही शब्द से रूपाणि, बहुवचन, “सैकड़ों और हज़ारों” के साथ उत्तर देते हैं। यह बेमेल अध्याय का लघु रूप है — देखने के लिए कभी एक आकार था ही नहीं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

paśya me pārtha rūpāṇiपश्य मे पार्थ रूपाणि
हे पार्थ, मेरे रूपों को देखो (paśya + me + pārtha + rūpāṇi)
śataśo'tha sahasraśaḥशतशोऽथ सहस्रशः
सैकड़ों और हज़ारों (śataśaḥ + atha + sahasraśaḥ)
nānāvidhāni divyāniनानाविधानि दिव्यानि
अनेक प्रकार के, दिव्य (nānā-vidhāni + divyāni)
nānāvarṇākṛtīni caनानावर्णाकृतीनि च
और अनेक रंगों तथा आकृतियों वाले (nānā-varṇa-ākṛtīni + ca)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Krishna’s answer opens with an imperative, not an explanation — “paśya,” behold, is the first word, and understanding is left to follow whatever gets seen. He doesn’t first tell Arjuna what the vision means and then show it: he puts the raw sight in front of him and lets meaning arrive afterward, in Arjuna’s own words, starting at verse 15. Some things have to be encountered before they can be explained.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप किसी बड़ी और अनजानी चीज़ का सामना कर रहे हों, तो उससे जुड़ने से पहले उसे पूरी तरह समझ लेने की प्रतीक्षा न करें — कभी-कभी सामना पहले होना ज़रूरी होता है, और समझ बाद में बनती है, आपके अपने शब्दों में, उससे जो आपने वास्तव में अनुभव किया।

व्यावसायिक

  • किसी को एक जटिल व्यवस्था से परिचित कराते समय, उसे छूने-बरतने से पहले ही ज़रूरत से ज़्यादा समझाने से बचें — पहले असली चीज़ उसके सामने रखें, और जो वह देखता है उसका उसका अपना वर्णन ही आगे की व्याख्या की दिशा तय करे।

परिवार और समाज

  • जब कोई आपसे किसी कठिन अनुभव को समझना चाहे जिससे आप गुज़रे हैं, तो कभी-कभी सच्चा उत्तर शुरू में ही पूरी व्याख्या देना नहीं, बल्कि 'मेरे साथ आकर इसे देखो' कहना होता है — उन्हें उसका सामना करने दें, फिर जो उन्होंने देखा उसे समझने में उनकी सहायता करें।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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