संस्कृत
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः । आश्वासयामास च भीतमेनम् भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥
ity arjunaṃ vāsudevas tathoktvā svakaṃ rūpaṃ darśayāmāsa bhūyaḥ āśvāsayāmāsa ca bhītam enam bhūtvā punaḥ saumyavapur mahātmā
अनुवाद
अर्जुन से ऐसा कहकर वासुदेव ने उसे फिर अपना रूप दिखाया, और उन महात्मा ने फिर से सौम्य रूप धारण करके उस भयभीत अर्जुन को धीरज बँधाया।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
संजय का वर्णन फिर से आरम्भ होता है और स्वयं इस वापसी की सूचना देता है, और शब्दों का चुनाव सटीक है — “स्वकं रूपम्”, उनका अपना रूप, और “सौम्यवपुः”, सौम्य शरीर वाले, किन्तु अभी पूरी तरह सामान्य दो भुजाओं वाले कृष्ण नहीं। यह वही चतुर्भुज रूप है जिसे अर्जुन ने श्लोक 46 में विशेष रूप से माँगा था, अनन्त दर्शन और पूर्ण मानवता के बीच की मध्य सीढ़ी; इस उतार का अन्तिम चरण, यानी परिचित मित्र और सारथी की ओर वापसी, अगले श्लोक में अर्जुन के अपने शब्दों में ही पूरा होता है। अध्याय इस वापसी को सावधानी से चरणों में ले जाता है; वह ब्रह्माण्डीय आतंक से झटके के साथ सीधे सामान्य साहचर्य पर नहीं उतर आता। स्वकं रूपम्, “उनका अपना रूप”, और सौम्य-वपुः, “सौम्य शरीर वाले” — किन्तु अभी सामान्य दो भुजाओं वाले कृष्ण नहीं। यह गीता 11.46 का चतुर्भुज रूप है, मध्य सीढ़ी; अध्याय ब्रह्माण्डीय आतंक से झटके से साहचर्य पर आने के बजाय इस उतार को चरणों में वापस ले जाता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- ity arjunaṃ vāsudevas tathoktvāइत्य् अर्जुनं वासुदेवस् तथोक्त्वा
- अर्जुन से इस प्रकार कहकर वासुदेव ने (iti + arjunam + vāsudevaḥ + tathā + uktvā)
- svakaṃ rūpaṃ darśayāmāsa bhūyaḥस्वकं रूपं दर्शयामास भूयः
- फिर से अपना रूप दिखाया (svakam + rūpam + darśayāmāsa + bhūyaḥ)
- āśvāsayāmāsa ca bhītam enamआश्वासयामास च भीतं एनं
- और इस भयभीत को धीरज बँधाया (āśvāsayāmāsa + ca + bhītam + enam)
- bhūtvā punaḥ saumyavapur mahātmāभूत्वा पुनः सौंयवपुः महात्मा
- महात्मा ने पुनः सौम्य रूप धारण करके (bhūtvā + punaḥ + saumya-vapuḥ + mahā-ātmā)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
It’s worth noticing the asymmetry in pacing: the vision escalated in a fairly compressed sequence of verses, but the descent back takes a deliberate two-step, this intermediate four-armed form first, full humanity only in the next verse. Overwhelm, in this chapter, arrives faster than it’s allowed to leave — the poem seems to know that stepping someone down from an extreme state takes more care than pushing them into one.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- किसी अभिभूत कर देने वाले अनुभव से उबरने में अक्सर सोच-समझकर उठाए गए चरणों में उससे अधिक समय लगता है, जितना उस अनुभव को आप पर टूट पड़ने में लगा था — यह अपेक्षा न करें कि आप उसी गति से सामान्य हो जाएँगे जिस गति से संकट आया था; इतने बड़े अनुभव से उबरना वास्तव में धीरे-धीरे, एक-एक कदम नीचे उतरने जैसा ही होता है।
व्यावसायिक
- काम पर किसी बड़ी घटना या संकट के बाद, एक ही झटके में 'सब कुछ सामान्य हो गया' घोषित करने से बचें — पूरी तरह सामान्य स्थिति में लौटने से पहले एक बीच का चरण रखें, जिसमें काम का दायरा कम हो और अतिरिक्त सहायता मिले; टीमें जिस समय-सीमा में संकट में उलझती हैं, उससे अलग समय-सीमा में ही उससे बाहर निकलती हैं।
परिवार और समाज
- परिवार में किसी बड़े आघात या टकराव के बाद, यह अपेक्षा न करें कि सब लोग उसी गति से सामान्य हो जाएँगे जिस गति से वे परेशान हुए थे — सब कुछ फिर से पूरी तरह सहज लगने की अपेक्षा करने से पहले, दोबारा जुड़ने के लिए एक बीच के, अधिक कोमल चरण की गुंजाइश रखें।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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