संस्कृत
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् । व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वम् तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥
mā te vyathā mā ca vimūḍhabhāvo dṛṣṭvā rūpaṃ ghoram īdṛṅ mamedam vyapetabhīḥ prītamanāḥ punas tvam tad eva me rūpam idaṃ prapaśya
अनुवाद
मेरे इस प्रकार के घोर रूप को देखकर तुम व्यथित मत हो और विमूढ़ भी मत हो। भय से मुक्त होकर और प्रसन्न मन से तुम फिर से मेरे उसी रूप को देखो।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
अर्जुन ने श्लोक 45 में जो विनती की थी — मुझे वह दूसरा रूप दिखाइए — वह यहाँ बिना किसी और परीक्षा या शर्त के पूरी कर दी जाती है। कृष्ण अर्जुन से यह नहीं कहते कि वह उस भय के भीतर थोड़ी देर और स्थिर रहे या आगे कुछ और सिद्ध करे; सांत्वना तुरंत मिलती है, “व्यपेतभीः”, भय से मुक्त होकर, और वह ठीक तभी दी जाती है जब पाठ (कालोऽस्मि, फिर कृपा, फिर अभ्यास की सीमाएँ) सचमुच मन में उतर चुका होता है। यह एक छोटी पर वास्तविक बात है कि यह अध्याय दया को किस तरह देखता है — सहनशीलता से अर्जित पुरस्कार के रूप में नहीं, बल्कि ऐसी चीज़ के रूप में जो उसी क्षण दी जाती है जब उसकी ज़रूरत होती है। गीता 11.45 की विनती बिना किसी और परीक्षा के पूरी कर दी जाती है — कृष्ण अर्जुन से भय के भीतर और देर तक स्थिर रहने को नहीं कहते। व्यपेत-भीः, “भय दूर हो गया”, पाठ के मन में उतरते ही दिया जाता है: यहाँ दया ठीक उसी क्षण दी जाती है जब उसकी ज़रूरत होती है, सहनशीलता से अर्जित नहीं की जाती।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- mā te vyathā mā ca vimūḍhabhāvoमा ते व्यथा मा च विमूढभावो
- तुम्हें न व्यथा हो, न मोह (mā + te + vyathā + mā + ca + vimūḍha-bhāvaḥ)
- dṛṣṭvā rūpaṃ ghoram īdṛṅ mamedamदृष्ट्वा रूपं घोरं ईदृङ् ममेदं
- मेरा ऐसा यह घोर रूप देखकर (dṛṣṭvā + rūpam + ghoram + īdṛk + mama + idam)
- vyapetabhīḥ prītamanāḥ punas tvamव्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस् त्वं
- भय से मुक्त और प्रसन्न मन होकर, तुम फिर (vyapeta-bhīḥ + prīta-manāḥ + punaḥ + tvam)
- tad eva me rūpam idaṃ prapaśyaतद् एव मे रूपं इदं प्रपश्य
- मेरा वही यह रूप देखो (tat + eva + me + rūpam + idam + prapaśya)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Krishna doesn’t just offer a calmer sight, he asks Arjuna to see it “punaḥ,” again — the ordinary form is framed as something being returned to, not something new being introduced. That word choice matters: recovery here isn’t presented as starting over from nothing, it’s presented as remembering a form Arjuna already knew, which is a gentler kind of return than being handed an unfamiliar comfort.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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व्यक्तिगत
- जब आप अभिभूत हों, तो पहला उपयोगी कदम अक्सर बस स्वयं को स्थिर करना होता है, न कि उस अनुभव से तुरंत कोई सीख निकालने की कोशिश करना — अर्थ बाद में भी समझ आ सकता है।
व्यावसायिक
- काम पर किसी सचमुच कठिन घटना या झटके के बाद, समीक्षा बैठक की शुरुआत संबंधित लोगों को आश्वस्त करके करें, और उसके बाद ही मूल कारण के विश्लेषण में उतरें — दोनों बातें महत्वपूर्ण हैं, पर एक ही साँस में नहीं।
परिवार और समाज
- किसी डरे हुए या अभिभूत व्यक्ति को सांत्वना देने के लिए यह प्रतीक्षा करना आवश्यक नहीं कि वह स्वयं को सँभालकर पहले उसका 'हकदार' बने — यह श्लोक सांत्वना तुरंत देता है, माँगते ही, बिना किसी परीक्षा के।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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