संस्कृत
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यम् त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥
tvam akṣaraṃ paramaṃ veditavyam tvam asya viśvasya paraṃ nidhānam tvam avyayaḥ śāśvatadharmagoptā sanātanas tvaṃ puruṣo mato me
अनुवाद
आप ही जानने योग्य परम अक्षर हैं, आप ही इस विश्व के परम आश्रय हैं। आप अविनाशी हैं, शाश्वत धर्म के रक्षक हैं; मेरे मत में आप ही सनातन पुरुष हैं।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
स्वर में एक संक्षिप्त बदलाव: दो श्लोकों तक केवल इन्द्रियों से अनुभव किए गए दृश्य का वर्णन करने के बाद, अर्जुन धर्मशास्त्रीय शब्दावली का सहारा लेते हैं — अक्षर (अविनाशी), धर्म-गोप्ता (शाश्वत धर्म के रक्षक), सनातन पुरुष (शाश्वत पुरुष)। ऐसा लगता है मानो वे उस दृश्य को उन परिचित शब्दों में नाम देकर स्वयं को स्थिर करने का प्रयास कर रहे हों जो उनके पास पहले से हैं, इससे पहले कि श्लोक 19 में वर्णन फिर से और तीव्र होने लगे। यह सहारा अधिक देर तक नहीं टिकता।
स्वर में एक संक्षिप्त बदलाव: अर्जुन धर्मशास्त्र का सहारा लेते हैं — अक्षर, धर्म-गोप्ता, सनातन पुरुष — और उस दृश्य को परिचित शब्दों में नाम देकर स्वयं को स्थिर करने का प्रयास करते हैं। यह सहारा टिकता नहीं; गीता 11.19 में वर्णन फिर से और तीव्र होने लगता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- tvam akṣaraṃ paramaṃ veditavyamत्वं अक्षरं परमं वेदितव्यं
- आप ही जानने योग्य परम अविनाशी अक्षर हैं (tvam + akṣaram + paramam + veditavyam)
- tvam asya viśvasya paraṃ nidhānamत्वं अस्य विश्वस्य परं निधानं
- आप ही इस विश्व के परम आश्रय हैं (tvam + asya + viśvasya + param + nidhānam)
- tvam avyayaḥ śāśvatadharmagoptāत्वं अव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता
- आप अव्यय हैं, शाश्वत धर्म के रक्षक (tvam + avyayaḥ + śāśvata-dharma-goptā)
- sanātanas tvaṃ puruṣo mato meसनातनस् त्वं पुरुषो मतो मे
- मेरे मत में आप सनातन पुरुष हैं (sanātanaḥ + tvam + puruṣaḥ + mataḥ + me)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
For one verse, Arjuna stops reporting what he’s seeing and starts reciting what he already knows — akṣara, dharma-goptā, sanātana puruṣa are received categories, not fresh description. It’s a recognizable move: when direct experience gets too intense to keep narrating moment to moment, reaching for familiar, general language is a way to regain footing. The text is honest that it’s a temporary measure — verse 19 pulls him straight back into specific, escalating sensory detail.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- जब कोई कच्चा अनुभव इतना तीव्र हो जाए कि उसे पल-पल समझते रहना कठिन लगे, तो स्वयं को सँभालने के लिए थोड़ी देर परिचित, सामान्य भाषा का सहारा लेना ठीक है — बस इसे एक विराम समझें, स्थायी समाधान नहीं, क्योंकि उस विशेष भावना का सामना संभवतः फिर से करना पड़ेगा।
व्यावसायिक
- वास्तविक दबाव में — जैसे किसी सिस्टम के ठप हो जाने पर या किसी कठिन वार्ता में — कुछ क्षण के लिए पहले से अभ्यास किए गए ढाँचों और परिचित शब्दावली का सहारा लेना संयम लौटाने का एक उचित तरीका है; बस उस विराम को यह न समझ बैठें कि आपके सामने खड़ी विशेष समस्या वास्तव में हल हो गई है।
परिवार और समाज
- जब कोई भावनात्मक बातचीत इतनी तीव्र हो जाए कि उसमें पूरी तरह उपस्थित रहना कठिन लगे, तो साँस लेने के लिए थोड़ी देर शांत, अधिक सामान्य भाषा का सहारा लेना ठीक है — बस सामने वाले व्यक्ति से ईमानदारी से कह दें कि आपको उस विशेष, अधिक कठिन बात पर फिर लौटना होगा।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
स्वयं से पूछें
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