संस्कृत
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । वेत्ताऽसि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥
tvam ādidevaḥ puruṣaḥ purāṇas tvam asya viśvasya paraṃ nidhānam vettā'si vedyaṃ ca paraṃ ca dhāma tvayā tataṃ viśvam anantarūpa
अनुवाद
आप आदिदेव हैं, सनातन पुरुष हैं; आप ही इस विश्व के परम आश्रय-निधान हैं। आप ही जानने वाले हैं और जानने योग्य भी, और आप ही परम धाम हैं। हे अनन्तरूप, यह सारा विश्व आपसे ही व्याप्त है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
अब विशेषण कृष्ण का बाहर से वर्णन करना छोड़ देते हैं और इसके बजाय उनके चारों ओर के भेदों को एक में समेटने लगते हैं: “वेत्तासि वेद्यं च”, आप ही जानने वाले हैं और आप ही जानने योग्य — विषयी और विषय एक ही में समाए हुए। विपरीत जोड़ों से नाम देने की यह शैली जितना एक दार्शनिक दावा है, उतना ही स्तोत्र की परंपरा भी है, पर इसकी शब्दावली (“पुरुषः पुराणः”, सनातन पुरुष) सीधे वैदिक सृष्टि-विचार तक जाती है — वही पुरुष, जिसके अंग-विभाजन के सहारे पुरुष सूक्त यह समझाता है कि संसार अपने अलग-अलग भागों में कैसे बँटा। वेत्तासि वेद्यं च — “आप ही जानने वाले हैं और आप ही जानने योग्य” — विषयी और विषय को एक ही में समेट देता है। विपरीत जोड़ों से नाम देने की यह शैली जितना एक दावा है, उतना ही स्तोत्र की परंपरा भी है; पुरुषः पुराणः सीधे पुरुष सूक्त तक जाता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- tvam ādidevaḥ puruṣaḥ purāṇasत्वं आदिदेवः पुरुषः पुराणस्
- आप आदिदेव हैं, सनातन पुरुष हैं (tvam + ādi-devaḥ + puruṣaḥ + purāṇaḥ)
- tvam asya viśvasya paraṃ nidhānamत्वं अस्य विश्वस्य परं निधानं
- आप इस विश्व के परम आश्रय हैं (tvam + asya + viśvasya + param + nidhānam)
- vettā'si vedyaṃ ca paraṃ ca dhāmaवेत्ताऽसि वेद्यं च परं च धाम
- आप ही जानने वाले हैं, जानने योग्य भी और परम धाम भी (vettā + asi + vedyam + ca + param + ca + dhāma)
- tvayā tataṃ viśvam anantarūpaत्वया ततं विश्वं अनन्तरूप
- हे अनन्तरूप, आपसे ही यह विश्व व्याप्त है (tvayā + tatam + viśvam + ananta-rūpa)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Once a description folds knower and known into the same referent, there is no remaining vantage point outside the claim from which to assess it — you can’t verify from a distance a subject that has already absorbed the position an observer would need. That collapse of the observing platform, more than the size of the vision, may be what actually makes it impossible to hold a normal, evaluative stance toward this figure.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- कुछ अनुभव — शोक, प्रेम में पड़ना, आस्था का कोई वास्तविक संकट — जब तक आप उनके भीतर होते हैं, आपसे उन्हें सुरक्षित बाहरी दूरी से परखने की क्षमता छीन लेते हैं। पहचानिए कि कब आप ऐसे ही किसी अनुभव में हैं, और अपने आप से यह अपेक्षा छोड़ दीजिए कि आप उसे उसी तटस्थता से आँकेंगे जिससे आप किसी ऐसी चीज़ को आँकते हैं जिसे आप केवल देख रहे हों।
व्यावसायिक
- जब प्रणाली आपने ही बनाई हो, कोड आपने ही लिखा हो, या निर्णय आपने ही लिया हो, तो उसकी निष्पक्ष समीक्षा के लिए आवश्यक बाहरी दृष्टि आप खो चुके होते हैं — जिस काम के आप इतने निकट हैं कि उसे स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते, उसके बारे में अपने ही निर्णय के भरोसे रहने के बजाय किसी ऐसे व्यक्ति को बुलाइए जो उसका रचयिता न हो।
परिवार और समाज
- जब किसी पारिवारिक विवाद में आप उतने ही उसका विषय हैं जितने उसे परखने वाले एक भागीदार, तो आपके पास वह बाहरी दृष्टि नहीं होती जो निष्पक्षता के लिए ज़रूरी है — अपनी समझ पर भरोसा करने की तुलना में किसी ऐसे व्यक्ति से पूछना, जो सचमुच उस स्थिति से बाहर हो, अक्सर अधिक ईमानदार कदम होता है।
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