संस्कृत
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य- मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् । पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम् स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥
anādimadhyāntam anantavīryam anantabāhuṃ śaśisūryanetram paśyāmi tvāṃ dīptahutāśavaktraṃ svatejasā viśvam idaṃ tapantam
अनुवाद
मैं आपको आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त शक्ति वाले और अनन्त भुजाओं वाले देखता हूँ। चन्द्रमा और सूर्य आपके नेत्र हैं, आपका मुख प्रज्वलित अग्नि के समान है, और आप अपने तेज से इस सम्पूर्ण विश्व को तपा रहे हैं।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
सूर्य और चन्द्रमा को नेत्रों के रूप में देखना (शशिसूर्यनेत्रम्) ब्रह्माण्डीय शरीर की वह कल्पना है जिसकी जड़ें पुरुष की वैदिक स्तुतियों में गहरी हैं, किन्तु इसके बाद की पंक्ति इसे भयावह बना देती है: प्रज्वलित यज्ञ-अग्नि जैसा मुख, जो अपने ही तेज से विश्व को तपा रहा है। यह मोड़ वाला श्लोक है — यहाँ वर्णन विस्मय से भरी गणना से हटकर किसी ऐसी चीज़ की ओर बढ़ता है जो खतरे के अधिक निकट है, और यह निगलते हुए जबड़ों जैसे मुखों की उस कल्पना की भूमिका बनाता है जो श्लोक 25 से 30 तक छाई रहती है। नेत्रों के रूप में सूर्य और चन्द्रमा पुरुष-स्तुतियों की पुरानी कल्पना है, किन्तु “प्रज्वलित यज्ञ-अग्नि जैसा, विश्व को तपाता हुआ” मुख इसे भयावह बना देता है। यह विस्मय से भरी गणना से खतरे की ओर का मोड़ है — गीता 11.25–गीता 11.30 के निगलते जबड़ों वाली कल्पना की ओर।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- anādimadhyāntam anantavīryamअनादिमध्यान्तं अनन्तवीर्यं
- आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त सामर्थ्य वाले (an-ādi-madhya-antam + ananta-vīryam)
- anantabāhuṃ śaśisūryanetramअनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रं
- अनन्त भुजाओं वाले, चन्द्रमा और सूर्य रूपी नेत्रों वाले (ananta-bāhum + śaśi-sūrya-netram)
- paśyāmi tvāṃ dīptahutāśavaktraṃपश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं
- मैं आपको देखता हूँ, प्रज्वलित अग्नि रूपी मुख वाले (paśyāmi + tvām + dīpta-hutāśa-vaktram)
- svatejasā viśvam idaṃ tapantamस्वतेजसा विश्वं इदं तपन्तं
- अपने तेज से इस विश्व को तपाते हुए (sva-tejasā + viśvam + idam + tapantam)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
“Svatejasā” — by its own splendor — is the detail that reframes the danger: the worlds aren’t being attacked, they’re being burned by the same radiance that makes the vision visible at all. There’s no separate act of aggression here, just scale itself becoming destructive past a certain point. The same light that lets Arjuna see is, without changing anything about itself, also what’s now scorching the universe.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- पहचानिए कि कोई चीज़ केवल अपने आकार या तीव्रता के कारण हानिकारक बन सकती है, भले ही उसके पीछे कोई शत्रुतापूर्ण इरादा न हो — कोई शक्ति या कोई सत्य, एक निश्चित आकार या गति से आगे बढ़ जाने पर, बस अपने स्वभाव के कारण ही नुकसान पहुँचाने लगता है, इसलिए नहीं कि वह आपके विरुद्ध हो गया।
व्यावसायिक
- जो तरीका छोटे स्तर पर सचमुच अच्छा है — आक्रामक अनुकूलन, तेज़ी से बार-बार सुधार — वह इरादे में कोई बदलाव आए बिना, केवल पैमाने के कारण विनाशकारी बन सकता है; उस बिंदु पर नज़र रखें जहाँ कोई शक्ति गलत होने से नहीं, बल्कि केवल बढ़ने से महँगी पड़ने लगती है।
परिवार और समाज
- किसी रिश्ते में तीव्रता — जुनून, ईमानदारी, निकटता — केवल इस कारण हानिकारक बन सकती है कि वह उससे आगे बढ़ जाए जिसे दोनों में से कोई भी व्यक्ति संभाल सकता है, भले ही किसी भी पक्ष का इरादा नुकसान पहुँचाने का न हो; ध्यान रखें कि केवल बुरा इरादा ही नहीं, स्वयं पैमाना भी समस्या बन सकता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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