4.7

संस्कृत

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ॥

yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata abhyutthānam adharmasya tadātmānaṃ sṛjāmy aham

अनुवाद

हे भरतवंशी, जब-जब धर्म का ह्रास होता है और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह वह श्लोक है जिसे अधिकांश पाठक गीता में अवतार के कथन के रूप में जानते हैं: जब-जब धर्म का ह्रास होता है और अधर्म बढ़ता है, तब “मैं स्वयं प्रकट होता हूँ।” श्लोक 8 के तीन प्रयोजनों और उसकी टेक “युगे युगे” — युग-युग में — के साथ मिलकर यह श्लोक श्लोक 5-6 के व्यक्तिगत दावे को एक सामान्य नियम में बदल देता है कि ईश्वरीय सत्ता इतिहास से किस प्रकार संबंध रखती है — बार-बार हस्तक्षेप, कोई एक अकेला अवतरण नहीं। इसे उस संकट के सीधे उत्तर के रूप में भी पढ़ा जा सकता है जिसके बीचोंबीच अर्जुन खड़ा है: अध्याय 1 में उसने जिस नैतिक पतन का वर्णन किया था, वह ठीक उसी प्रकार का ह्रास है जिसे यह सिद्धांत संबोधित करता है। ग्लानि — “क्षीण होना, शिथिल पड़ना” — यह शब्द बताता है कि धर्म पर सक्रिय रूप से आक्रमण नहीं हो रहा, बल्कि उसका कसाव ढीला पड़ रहा है; अवतरण केवल आक्रमण का ही नहीं, क्षरण का भी उत्तर है। गीता 1.40–गीता 1.43 के साथ रखकर पढ़ें तो कुरुक्षेत्र का मैदान ऐसे ही एक क्षण के रूप में प्रस्तुत होता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

yadā yadā hiयदा यदा हि
जब-जब (yadā + yadā + hi)
dharmasya glānir bhavatiधर्मस्य ग्लानिः भवति
धर्म की हानि होती है (dharmasya + glāniḥ + bhavati)
bhārataभारत
हे भारत
abhyutthānam adharmasyaअभ्युत्थानं अधर्मस्य
अधर्म का उत्थान (abhyutthānam + adharmasya)
tadātmānaṃ sṛjāmy ahamतदात्मानं सृजांय् अहं
तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ (tadā + ātmānam + sṛjāmi + aham)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The verse is stated as a general law — whenever dharma decays, intervention follows — but its immediate rhetorical force comes from how precisely it answers one particular person’s crisis in this exact moment. Krishna never says “and this applies to you, right now,” yet the whole weight of the verse depends on Arjuna hearing it that way; the universal claim only lands because a specific application is implied underneath it.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

Site Commentary — Second Reading

Sṛjāmi — “I bring forth myself” — describes a recurring mechanism rather than a single biographical event, confirmed by the next verse’s “yuge yuge,” age after age. Stripped of its theology, the claim is structural: a system oriented around a governing principle generates its own corrective response only after that principle has decayed past some threshold, never before. That pattern is recognizable outside any battlefield or scripture — the failure that finally forces the fix, the neglected process nobody touches until it breaks.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जिस सिद्धांत में आप विश्वास करते हैं, वह तब तक अमूर्त ही रहता है जब तक आप उसे अपनी वास्तविक, अभी की स्थिति का उत्तर देते हुए न देख लें — केवल सामान्य सत्य को दोहराते न रहें, बल्कि उससे लेकर आज आप जिसका सामना कर रहे हैं, उस तक की ठीक-ठीक रेखा खोजें।

व्यावसायिक

  • जब आप अपनी टीम को कोई रणनीतिक सिद्धांत समझाएँ, तो उसके प्रयोग को अनकहा न छोड़ें — पहले सामान्य विचार बताएँ, फिर उसे स्पष्ट रूप से उनके सामने खड़ी विशिष्ट समस्या से जोड़ें, ठीक वैसे ही जैसे इस श्लोक का बल इस पर निर्भर करता है कि अर्जुन यह संबंध स्वयं जोड़े।

परिवार और समाज

  • संकट में पड़े किसी व्यक्ति को किसी सामान्य सत्य से ढाढ़स बँधाते समय, उसकी ठीक-ठीक स्थिति से उसका संबंध स्पष्ट रूप से जोड़ें, उसे स्वयं अनुमान लगाने के लिए न छोड़ें — जिस अमूर्त बात का अर्थ उन्हें स्वयं निकालना पड़े, वह उस बात की तुलना में कहीं कम असर करती है जिसे आपने पहले ही उनकी स्थिति पर लागू करके दे दिया हो।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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