संस्कृत
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥
yadā viniyataṃ cittam ātmany evāvatiṣṭhate niḥspṛhaḥ sarvakāmebhyo yukta ity ucyate tadā
अनुवाद
जब भली-भाँति वश में किया हुआ चित्त आत्मा में ही स्थित हो जाता है और मनुष्य सभी कामनाओं से निःस्पृह हो जाता है, तब वह युक्त कहलाता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह श्लोक 4 में बताई गई योगारूढ़ अवस्था — संकल्प से मुक्ति और अनासक्ति — को इस खण्ड की शब्दावली में फिर से कहता है: संयमित चित्त आत्मा में स्थित है और कामना से मुक्त है। श्लोक 19 ठीक इसी अवस्था के लिए अध्याय की सबसे यादगार उपमा देता है। आत्मन्येवावतिष्ठते — “केवल आत्मा में ही स्थिर रहता है” — यह योगयुक्त अवस्था को एक स्थान के रूप में व्यक्त करता है: मन ने बाहर जाना बंद कर दिया है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- yadā viniyataṃ cittamयदा विनियतं चित्तं
- जब संयमित चित्त (yadā + viniyatam + cittam)
- ātmany evāvatiṣṭhateआत्मन्य् एवावतिष्ठते
- आत्मा में ही स्थित हो जाता है (ātmani + eva + avatiṣṭhate)
- niḥspṛhaḥ sarvakāmebhyoनिःस्पृहः सर्वकामेभ्यो
- सभी कामनाओं से निःस्पृह (niḥspṛhaḥ + sarva-kāmebhyaḥ)
- yukta ity ucyate tadāयुक्त इत्य् उच्यते तदा
- तब वह युक्त कहलाता है (yuktaḥ + iti + ucyate + tadā)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
This is the third time the chapter has described the same interior state in different words — non-attachment in verse 4, the friend/enemy resolution in verses 5-6, now “subdued thought fixed on the Self, free from longing.” The repetition isn’t padding; each pass adds a vocabulary the next image (verse 19’s lamp) needs in place before it can land.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- अगर आप किसी एक ही निजी अंतर्दृष्टि को थोड़े-थोड़े अलग शब्दों में बार-बार कहते रहते हैं, तो यह व्यर्थ की दोहराहट नहीं है — हर नया ढंग शायद वही हो जो आख़िरकार उस विचार को काम का बना दे। विचार के पूरी तरह मन में उतरने की अपेक्षा करने से पहले उसे दोबारा कहने की छूट ख़ुद को दें।
व्यावसायिक
- जब आप अपनी टीम को कोई कठिन अवधारणा तीसरी बार अलग शब्दों में समझा रहे हों, तो यह इस बात का संकेत नहीं है कि आप अपनी बात पहुँचाने में विफल हो रहे हैं — अलग-अलग लोगों तक अलग-अलग ढंग से कही गई बात पहुँचती है, और अक्सर यही दोहराव अंततः बात के समझ में आने को संभव बनाता है।
परिवार और समाज
- अगर आपने परिवार के किसी सदस्य को अपनी कोई सीमा या ज़रूरत कई बार अलग-अलग शब्दों में समझाई है, तो इसे विफलता न समझें — कभी-कभी एक ही बात सचमुच समझ में आने से पहले उसे कई ढंग से कहना पड़ता है, और यह सुने जाने की प्रक्रिया का एक सामान्य हिस्सा है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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