संस्कृत
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥
tattvavit tu mahābāho guṇakarmavibhāgayoḥ guṇā guṇeṣu vartanta iti matvā na sajjate
अनुवाद
परन्तु हे महाबाहु, जो गुणों और कर्मों के विभाग के तत्त्व को जानता है, वह यह मानकर कि गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, आसक्त नहीं होता।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
श्लोक 27 के मोह का सुधार: यह जानना कि गुण ही गुणों पर क्रिया कर रहे हैं — इन्द्रियाँ, जो स्वयं भौतिक हैं, इन्द्रिय-विषयों से जुड़ रही हैं, जो भी भौतिक हैं — न कि कोई आत्मा कुछ कर रही है, यही वास्तव में अनासक्ति उत्पन्न करता है। यह अनासक्ति को इच्छाशक्ति के नैतिक प्रयास के रूप में कम, और सही तात्त्विक समझ के परिणाम के रूप में अधिक प्रस्तुत करता है — एक ऐसा सूत्र जिसे ग्रंथ अध्याय 14 में कहीं आगे विकसित करता है। “गुणा गुणेषु वर्तन्ते” — गुण गुणों के बीच गति करते हैं — लगभग एक टेक बन जाता है; यह गीता 5.9 में लगभग शब्दशः दोहराया गया है और गीता 14.19 का आधार है। इस विवेचन के अनुसार, अनासक्ति वह है जो गलत आरोपण के रुक जाने पर शेष रह जाती है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- tattvavit tu mahābāhoतत्त्ववित् तु महाबाहो
- किंतु हे महाबाहु, तत्त्व को जानने वाला (tattva-vit + tu + mahā-bāho)
- guṇakarmavibhāgayoḥगुणकर्मविभागयोः
- गुणों और कर्मों के विभाग का (guṇa-karma-vibhāgayoḥ)
- guṇā guṇeṣu vartantaगुणा गुणेषु वर्तन्त
- गुण ही गुणों में बरतते हैं (guṇāḥ + guṇeṣu + vartante)
- iti matvā na sajjateइति मत्वा न सज्जते
- ऐसा मानकर आसक्त नहीं होता (iti + matvā + na + sajjate)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
This verse quietly relocates the entire problem of attachment from the will to the intellect. It doesn’t say “try not to be attached” — it says know correctly, and non-attachment follows as a byproduct, not a target pursued directly. That’s a very different kind of effort: not gritting through desire, but replacing the belief that generates the grip in the first place.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- अगर केवल इच्छाशक्ति से किसी आदत की आप पर पकड़ ढीली नहीं हो पा रही है, तो सीधे व्यवहार से जूझने के बजाय उसके नीचे छिपी धारणा पर प्रहार करके देखें — सही समझ उस आसक्ति को घोल सकती है जिसे ज़ोर-ज़बरदस्ती का प्रयास हिला भी नहीं पाया।
व्यावसायिक
- जब कोई टीम किसी बार-बार लौटने वाली समस्या से अतिरिक्त मेहनत और चौकसी के सहारे दाँत भींचकर जूझती रहती है, तो जाँचिए कि कहीं असली समाधान उस व्यवस्था का सुधरा हुआ मानसिक मॉडल तो नहीं है — कभी-कभी समाधान विफलता के ढंग को स्पष्ट रूप से देख लेना होता है, उससे बचने के लिए और ज़्यादा कोशिश करना नहीं।
परिवार और समाज
- अगर आप परिवार के किसी सदस्य के प्रति एक ख़ास तरह से प्रतिक्रिया न करने की 'और ज़्यादा कोशिश' करते रहते हैं और बात टिक नहीं पाती, तो इसके बजाय उस धारणा को देखें जो उस प्रतिक्रिया को चला रही है — स्थिति के बारे में अपनी समझ बदलने से अक्सर वह पकड़ ढीली हो जाती है जिसे केवल प्रयास ढीला नहीं कर पाया।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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