संस्कृत
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥
annād bhavanti bhūtāni parjanyād annasambhavaḥ yajñād bhavati parjanyo yajñaḥ karmasamudbhavaḥ
अनुवाद
अन्न से सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं, वर्षा से अन्न उत्पन्न होता है, यज्ञ से वर्षा होती है और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह एक शृंखलाबद्ध तर्क है — प्राणी अन्न पर निर्भर हैं, अन्न वर्षा पर, वर्षा यज्ञ पर, और यज्ञ कर्म पर — जो उस कार्य-कारण चक्र को पूरा करता है जिसे श्लोक 15 स्पष्ट रूप से “चक्र” कहेगा। हर कड़ी एक वास्तविक पारिस्थितिक निर्भरता है — वर्षा सचमुच अन्न उपजाती है — जिसे कर्म के ब्रह्मांडीय कार्य के बारे में एक तात्त्विक दावे के रूप में काम में लिया गया है। इसमें कृषि के तथ्य और कर्मकांड के धर्मशास्त्र के बीच की रेखा धुँधली हो जाती है, और यही इस तर्क की कार्य-पद्धति की विशेषता है।
अध्याय के पृष्ठ पर दिया गया चित्र इस शृंखला को एक घूमते हुए चक्र के रूप में प्रस्तुत करता है। चाहे कोई “यज्ञ → वर्षा” को शाब्दिक अर्थ में पढ़े, या इस दावे के रूप में कि देने वालों का संसार भरा-पूरा रहता है जबकि केवल लेने वालों का संसार नहीं, संरचना की बात अपनी जगह कायम रहती है: आपका कर्म एक ऐसी कड़ी है जिस पर दूसरे निर्भर हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- annād bhavanti bhūtāniअन्नाद् भवन्ति भूतानि
- अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं (annāt + bhavanti + bhūtāni)
- parjanyād annasambhavaḥपर्जन्याद् अन्नसंभवः
- वर्षा से अन्न उत्पन्न होता है (parjanyāt + anna-sambhavaḥ)
- yajñād bhavati parjanyoयज्ञाद् भवति पर्जन्यो
- यज्ञ से वर्षा होती है (yajñāt + bhavati + parjanyaḥ)
- yajñaḥ karmasamudbhavaḥयज्ञः कर्मसमुद्भवः
- यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है (yajñaḥ + karma-samudbhavaḥ)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Read on its own, the chain — food from rain, rain from sacrifice, sacrifice from action — is a closed loop with no named starting point; it could describe a self-sustaining system with no origin at all. It’s only verse 15, anchoring the whole chain in Brahman, that breaks the circularity and gives the loop a first cause.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
Site Commentary — Second Reading
Stripped of its ritual vocabulary, the chain described here — creatures need food, food needs rain, rain needs an input from the very system that consumes it — is the same structure behind any commons: a community garden, a mailing list, an open-source project, all of which stay alive only as long as enough participants put something back rather than only drawing out. The verse’s leap from ecology to obligation isn’t a category error; it’s the oldest argument for why a shared resource collapses once “sacrifice” — voluntary contribution back into the pool — drops below what’s being withdrawn. Read this way, yajña isn’t primarily about ritual at all; it’s an early name for what keeps any commons solvent.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप अपने लिए आदत का कोई चक्र बना रहे हों — प्रयास से परिणाम, परिणाम से प्रेरणा, और प्रेरणा से और प्रयास — तो याद रखें कि एक बंद चक्र यह नहीं बताता कि वह शुरू कैसे हुआ। उस वास्तविक पहले कारण को पहचानें जिसके भरोसे आप इसे शुरू करने वाले हैं, न कि केवल उस चक्र को जो एक बार चल पड़ने पर अपने आप चलता रहता है।
व्यावसायिक
- जब आप किसी प्रणाली के लिए फ़ीडबैक चक्र का आरेख बनाएँ — डिप्लॉय से भरोसा बढ़ता है, भरोसे से और डिप्लॉय संभव होते हैं — तो याद रखें कि केवल आरेख यह नहीं बताता कि यह चक्र शुरू में कैसे खड़ा किया गया था। उस वास्तविक आरंभिक घटना को दर्ज करें, न कि केवल स्थिर अवस्था वाले चक्र को।
परिवार और समाज
- जब कोई पारिवारिक परंपरा अपने आप चलती हुई लगे — सब इसलिए आते हैं क्योंकि सब हमेशा आते रहे हैं — तो याद रखें कि किसी ने कभी इसे सोच-समझकर शुरू किया था। उस मूल चुनाव को पहचानना और उसका सम्मान करना परंपरा को केवल आदतवश नहीं, बल्कि जान-बूझकर जीवित रखता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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