3.31

संस्कृत

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥

ye me matam idaṃ nityam anutiṣṭhanti mānavāḥ śraddhāvanto'nasūyanto mucyante te'pi karmabhiḥ

अनुवाद

जो मनुष्य श्रद्धा से युक्त होकर और दोष-दृष्टि से रहित होकर मेरे इस मत का नित्य पालन करते हैं, वे भी कर्मों से मुक्त हो जाते हैं।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह एक परिणाम-वाक्य है जो “मेरे इस उपदेश” से जुड़ा है — यानी श्लोक 3 से चल रहा पूरा कर्मयोग का तर्क, जिसे अब श्लोक 30 के समर्पण-निर्देश ने पूरा किया है। जो लोग श्रद्धा के साथ और दोष निकाले बिना इसका पालन करते हैं, उन्हें यह वाक्य कर्म के बंधन से मुक्ति का वचन देता है। श्लोक 32 तुरंत इसका उलटा, नकारात्मक रूप सामने रखता है। दोनों शर्तें किसी कारण से साथ-साथ रखी गई हैं: श्रद्धा (इतना भरोसा कि प्रमाण मिलने से पहले ही आप अभ्यास करें) और अनसूया (जो बात आप अभी समझ नहीं पाए हैं, उस पर छींटाकशी न करना)। किसी उपदेश के फलदायी होने की पहली शर्त श्रद्धा है — यह दावा गीता बार-बार करती है, और सबसे पूर्ण रूप में अध्याय 17 में।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

ye me matam idaṃ nityamये मे मतं इदं नित्यं
जो मेरे इस मत का सदा (ye + me + matam + idam + nityam)
anutiṣṭhantiअनुतिष्ठन्ति
पालन करते हैं
mānavāḥमानवाः
मनुष्य
śraddhāvanto'nasūyantoश्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो
श्रद्धा से युक्त, दोष न ढूँढ़ने वाले (śraddhā-vantaḥ + anasūyantaḥ)
mucyante te'pi karmabhiḥमुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः
वे भी कर्मों से मुक्त हो जाते हैं (mucyante + te + api + karmabhiḥ)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Two conditions are named, not one: shraddha, faith, and separately, freedom from caviling — anasūya, a term closer to “not begrudging” or “not nitpicking in bad faith” than simple doubt. That’s a real distinction worth keeping: honest questioning of a teaching isn’t what’s being ruled out here, a particular contrarian posture that picks at something without ever seriously engaging it is.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • आप जिस अभ्यास को आज़मा रहे हैं, उसके बारे में ईमानदार संदेह ठीक है और उपयोगी भी — प्रगति को वास्तव में जो रोकता है, वह एक अलग ही आदत है: उससे कभी गंभीरता से जुड़े बिना उसमें मीन-मेख निकालते रहना, जिसे यह श्लोक श्रद्धा से अलग, स्वतंत्र रूप से रेखांकित करता है।

व्यावसायिक

  • कोई नई प्रक्रिया या नया साधन अपनाते समय अपनी उचित तकनीकी आपत्तियों को हर नई चीज़ के प्रति आदतन, छिद्रान्वेषी विरोध से अलग पहचानें — पहली चीज़ उसे लागू करने की प्रक्रिया को बेहतर बनाती है, जबकि दूसरी उससे कभी ईमानदारी से जुड़े बिना बस उसे अटका देती है।

परिवार और समाज

  • यदि आपका कोई निकट व्यक्ति कोई नई आदत या नया तरीका आज़मा रहा है, तो ईमानदार प्रश्न पूछने और आदतन उस पर ताने कसने के अंतर पर ध्यान दें — दूसरा तरीका उन्हें इस तरह कमज़ोर करता है जैसे सच्ची जिज्ञासा कभी नहीं करती।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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