संस्कृत
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् । तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥
karma brahmodbhavaṃ viddhi brahmākṣarasamudbhavam tasmāt sarvagataṃ brahma nityaṃ yajñe pratiṣṭhitam
अनुवाद
जान लो कि कर्म ब्रह्म से उत्पन्न होता है, और ब्रह्म अक्षर से उत्पन्न हुआ है। इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म सदा यज्ञ में प्रतिष्ठित है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
श्लोक 14 की शृंखला को यहाँ अपना तत्त्वमीमांसीय आधार मिलता है: कर्म का मूल ब्रह्म में है, और ब्रह्म का मूल अविनाशी (अक्षर) में — इसलिए इसी तर्क से सर्वव्यापी सनातन तत्त्व हर यज्ञ-कर्म के भीतर शाब्दिक अर्थ में उपस्थित है। ब्रह्मांड-संबंधी तर्क इससे ऊँचे बिंदु तक नहीं पहुँचता; इसके बाद श्लोक 16 चक्र के रूपक के सहारे इसे फिर से नैतिक भाषा में ले आता है। यहाँ उद्देश्य साधारण कार्य को ऊपर उठाकर परम सत्य के संपर्क में लाना है: यदि ब्रह्म अर्पण के कर्म में उपस्थित है, तो कर्मयोग कोई निचला मार्ग नहीं, बल्कि सीधा मार्ग है। अध्याय 4 का गीता 4.24 इसे स्पष्ट कर देता है — अर्पण, अर्पण करने वाला और अग्नि, सब ब्रह्म हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- karma brahmodbhavaṃ viddhiकर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि
- कर्म को ब्रह्म से उत्पन्न जानो (karma + brahma-udbhavam + viddhi)
- brahmākṣarasamudbhavamब्रह्माक्षरसमुद्भवं
- ब्रह्म अक्षर से उत्पन्न है (brahma + akṣara-samudbhavam)
- tasmāt sarvagataṃ brahmaतस्मात् सर्वगतं ब्रह्म
- इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म (tasmāt + sarvagatam + brahma)
- nityaṃ yajñe pratiṣṭhitamनित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितं
- सदा यज्ञ में प्रतिष्ठित है (nityam + yajñe + pratiṣṭhitam)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The claim is oddly specific for something described as all-pervading: Brahman isn’t just present everywhere in general, it’s said to be “ever present in sacrifice” in particular. An unlocatable, all-permeating reality is here given something close to an address — the verse localizes the infinite just enough to make it practically approachable through one specific act.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- जब आपका कोई मूल्य — करुणा, ईमानदारी — इतना अमूर्त और बिखरा हुआ लगे कि उसे सचमुच जीया न जा सके, तो कोई एक विशेष, बार-बार होने वाला कार्य चुनें जिसमें आप उसे जान-बूझकर स्थापित करें। जिस आदर्श का कोई ठिकाना नहीं, वह तभी काम का बनता है जब आप उसे प्रकट होने के लिए एक ठोस जगह दें।
व्यावसायिक
- जब कंपनी का कोई मूल्य — 'नवाचार', 'उत्कृष्टता' — इतना बिखरा हुआ हो कि उस पर अमल न किया जा सके, तो उसे किसी एक विशेष, बार-बार होने वाले अभ्यास से जोड़ें जिसकी ज़िम्मेदारी आपकी टीम की हो, जैसे साप्ताहिक समीक्षा बैठक या डिज़ाइन समीक्षा। उस अमूर्त मूल्य को अपनी कार्य-प्रक्रिया में एक वास्तविक पता दें।
परिवार और समाज
- जब 'एक अच्छा जीवनसाथी होना' या 'सचमुच साथ होना' इतना अस्पष्ट लगे कि उसे थामे रखना कठिन हो, तो कोई एक विशेष, बार-बार आने वाला क्षण चुनें — रात को एक-दूसरे का हाल पूछना, हर सप्ताह साथ बाहर जाना — जिसमें आप उस मूल्य को जान-बूझकर स्थापित करें। अमूर्त बात तब वास्तविक बन जाती है जब उसे रहने के लिए एक निश्चित जगह मिल जाती है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
स्वयं से पूछें
इस श्लोक को पढ़ने से आगे ले जाने के कुछ तरीके। टिक और नोट इसी ब्राउज़र में रहते हैं।