3.1

संस्कृत

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥

jyāyasī cet karmaṇas te matā buddhir janārdana tat kiṃ karmaṇi ghore māṃ niyojayasi keśava

अनुवाद

हे जनार्दन, यदि आपके मत में कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ है, तो हे केशव, आप मुझे इस घोर कर्म में क्यों लगा रहे हैं?

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

अर्जुन वह प्रश्न फिर से उठाते हैं जिसे अध्याय 2 अधूरा छोड़ गया था: यदि बुद्धि — समझ, विवेक — कर्म से श्रेष्ठ है, तो कृष्ण उन्हें बार-बार अपने ही स्वजनों को मारने के “घोर कर्म” की ओर क्यों ले जा रहे हैं? यह कृष्ण के अपने ही कथन पर एक उचित आपत्ति है, क्योंकि 2.49 में वे पहले ही कर्म को बुद्धि के योग से निकृष्ट कह चुके थे। पूरा अध्याय 3 इसी एक आपत्ति का कृष्ण द्वारा दिया गया उत्तर है, इसलिए श्लोक 1 को कोई चलताऊ शिकायत न मानकर पूरे अध्याय का मूल प्रश्न मानना उचित है। यह उलझन सच्ची है, हठ नहीं: अर्जुन ने सुना है कि गीता 2.49 कर्म को बुद्धियोग से नीचे रखता है और गीता 2.47 उन्हें कर्म करने का आदेश देता है, और वे समझ नहीं पा रहे कि दोनों बातें एक साथ कैसे सही हो सकती हैं। गीता 3.3 से आरम्भ होने वाला कृष्ण का उत्तर यह है कि ये दोनों कभी परस्पर विरोधी मार्ग थे ही नहीं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

jyāyasī cetज्यायसी चेत्
यदि श्रेष्ठ है (jyāyasī + cet)
karmaṇas te matā buddhirकर्मणस् ते मता बुद्धिः
कर्म से, आपके मत में, बुद्धि (karmaṇaḥ + te + matā + buddhiḥ)
janārdanaजनार्दन
हे जनार्दन
tat kiṃतत् किं
तो फिर क्यों (tat + kim)
karmaṇi ghoreकर्मणि घोरे
इस घोर कर्म में (karmaṇi + ghore)
māṃमां
मुझे
niyojayasiनियोजयसि
लगा रहे हैं
keśavaकेशव
हे केशव

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Arjuna isn’t backsliding into the confusion chapter 2 resolved — he’s doing something more exacting: holding Krishna to a contradiction between what Krishna said in 2.49 and what he is now asking him to do. The whole chapter that follows owes its existence to Arjuna refusing to let an inconsistency slide just because it came from his teacher. Noticing a teacher’s contradiction and saying so, rather than quietly re-explaining it away, is often what pulls a real answer out of them.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप देखें कि जिस व्यक्ति के मार्गदर्शन पर आप भरोसा करते हैं, वह अपनी ही पहले कही किसी बात का खंडन कर रहा है, तो चुपचाप अपने ढंग से उसका अर्थ निकाल लेने के बजाय उस विशेष अंतर को स्पष्ट रूप से कहें — अर्जुन की सीधी चुनौती ही कृष्ण से उनका वास्तविक उत्तर निकलवाती है, और मन में दबा लिया गया विरोधाभास शायद ही कभी अपने आप सुलझता है।

व्यावसायिक

  • जब किसी नेतृत्वकर्ता का वर्तमान निर्देश उनके पहले बताए किसी सिद्धांत के विपरीत लगे, तो चुपचाप मान लेने या मन ही मन नाराज़ होने के बजाय उस विशेष विरोधाभास को स्पष्ट रूप से सामने रखें — इस तरह की सीधी आपत्ति से एक सुसंगत उत्तर मिलता है, न कि दो परस्पर विरोधी निर्देश जो साथ-साथ बने रहते हैं।

परिवार और समाज

  • यदि आपका कोई करीबी ऐसी सलाह दे जो उसकी पहले कही किसी बात के विपरीत हो, तो जो भी बात सबसे बाद में कही गई उसी पर चल पड़ने के बजाय उस विशेष अंतर की ओर ध्यान दिलाएँ — असंगति को स्पष्ट रूप से कहना चुपचाप मान लेने से अधिक उनका सम्मान करता है, और अक्सर इसी से आपको उनका वास्तविक उत्तर मिलता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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