3.43

संस्कृत

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥

evaṃ buddheḥ paraṃ buddhvā saṃstabhyātmānam ātmanā jahi śatruṃ mahābāho kāmarūpaṃ durāsadam

अनुवाद

इस प्रकार बुद्धि से भी परे जो है, उसे जानकर और आत्मा द्वारा आत्मा को स्थिर करके, हे महाबाहु, इस कामरूपी दुर्जय शत्रु को मार डालो।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

अध्याय का यह समापन-निर्देश श्लोक 36 से अब तक कही गई हर बात को एक साथ जोड़ देता है: बुद्धि से परे जो है उसे जानकर (श्लोक 42), मनुष्य उच्चतर आत्मा के द्वारा साधारण स्व को स्थिर करता है और उस शत्रु का वध करता है जिसका नाम श्लोक 37 में ही लिया गया था। “आत्मा के द्वारा आत्मा को” एक ऐसा सूत्र है जिसे गीता 6.5-6 में फिर से प्रयोग करती है, और यह अध्याय की पूरी यात्रा को — जो ज्ञान बनाम कर्म को लेकर अर्जुन की आरंभिक उलझन से शुरू हुई थी — एक ही समापन-छवि में समेट देता है: युद्ध करो, पर काम से युद्ध करो, और उसी क्षमता के सहारे — बुद्धि, जो अपने से परे किसी आधार में टिकी हो — जिस पर प्रश्न उठाकर श्लोक 1 ने इस अध्याय का आरंभ किया था। जो अध्याय अर्जुन द्वारा बुद्धि को कर्म के विरुद्ध खड़ा करने से शुरू हुआ था, वह दोनों को एक ही पक्ष में रखकर समाप्त होता है: आत्मा में स्थिर बुद्धि ही ठीक वह चीज़ है जो सही कर्म को संभव बनाती है। बाहरी युद्ध कभी रद्द नहीं होता — केवल उसका लक्ष्य बदल दिया जाता है, और सबसे पहले काम की ओर।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

evaṃ buddheḥ paraṃ buddhvāएवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा
इस प्रकार बुद्धि से परे को जानकर (evam + buddheḥ + param + buddhvā)
saṃstabhyātmānam ātmanāसंस्तभ्यात्मानं आत्मना
आत्मा को आत्मा द्वारा स्थिर करके (saṃstabhya + ātmānam + ātmanā)
jahi śatruṃ mahābāhoजहि शत्रुं महाबाहो
हे महाबाहु, शत्रु को मारो (jahi + śatrum + mahā-bāho)
kāmarūpaṃ durāsadamकामरूपं दुरासदं
कामरूपी, जिसे जीतना कठिन है (kāma-rūpam + durāsadam)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

“The self by the Self” repeats one word in two grammatical cases rather than introducing two different terms — a small detail that carries the whole verse’s real claim. Despite the martial language of slaying an enemy, the actual mechanism described is entirely reflexive: nothing external is enlisted to do the restraining. The same self that’s ruled is doing the ruling, from a vantage point within itself rather than a battalion recruited from outside.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • किसी कठिन आवेग को संभालने के लिए जिस अनुशासन की आपको ज़रूरत है, वह आपके बाहर से नहीं आएगा — न इच्छाशक्ति के सहारों से, न व्यवस्थाओं से, न दूसरों के नियमों से — उसे आपकी अपनी ऊँची स्पष्टता से आना होगा, जो आपकी अपनी निचली प्रतिक्रिया पर शासन करे; असली उपाय भीतर खोजिए, बाहरी दबाव में नहीं।

व्यावसायिक

  • जब आप किसी टीम में अनुशासन लाने का प्रयास करें, तो याद रखें कि स्थायी बदलाव टीम के अपने ऊँचे स्तर के विवेक से आता है, जो उसकी अपनी निचले स्तर की आदतों पर शासन करता है, केवल बाहरी आदेशों से नहीं — बाहर से थोपे गए नियम शायद ही कभी भीतर अपनाए गए मानकों का स्थान ले पाते हैं।

परिवार और समाज

  • अपने किसी निकट व्यक्ति के साथ टकराव को आप जिस तरह संभालते हैं, उसमें सच्चा बदलाव किसी बाहरी नियम से या दबाव में किए गए वादे से नहीं आएगा — वह आपके अपने शांत, अधिक स्पष्ट स्वरूप से आता है, जो सचमुच आपके अपने प्रतिक्रियाशील स्वरूप पर शासन करे; यही एकमात्र उपाय है जो कभी काम कर सकता था।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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